सीयूएसबी के प्रो. सुरेश चन्द्र के साहित्य पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न
आर्यावर्त वाणी | गयाजी | 30 जून 2026,
गयाजी: दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) के भारतीय भाषा विभागाध्यक्ष एवं वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. सुरेश चन्द्र के साहित्यिक योगदान पर केंद्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफलतापूर्वक समापन हुआ। ‘डॉ. आंबेडकर की विचारधारा और सुरेश चन्द्र का साहित्य’ विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में देशभर के साहित्यकारों, शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं ने भाग लेकर दलित साहित्य, सामाजिक न्याय और डॉ. भीमराव आंबेडकर की वैचारिकी पर व्यापक चर्चा की।
कई संस्थानों के संयुक्त तत्वावधान में हुआ आयोजन
राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन मुन्द्रिका सिंह यादव महाविद्यालय, किंजर (अरवल), डॉ. बी.आर. आंबेडकर जन्मशताब्दी महाविद्यालय, धनसारी (अलीगढ़) तथा अधिकरण प्रकाशन, दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में बोधगया स्थित अंतरराष्ट्रीय साधना केंद्र, मियां बिगहा में किया गया। कार्यक्रम का संयोजन केआईएसएस, भुवनेश्वर के हिंदी विभाग के प्राध्यापक डॉ. रुद्र चरण माझी ने किया।
बुद्ध वंदना के साथ हुआ शुभारंभ
संगोष्ठी का उद्घाटन अंतरराष्ट्रीय साधना केंद्र के प्रबंधक पूज्य भन्ते शासन पाल ने बुद्ध वंदना के साथ किया। अध्यक्षता मुन्द्रिका सिंह यादव महाविद्यालय के प्राचार्य अवधेश प्रसाद ने की। मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार श्रीप्रकाश मिश्र तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. बी.पी. नलिन, डॉ. सच्चिदानन्द प्रेमी एवं लेखक हिमांशु शेखर उपस्थित रहे। स्वागत भाषण डॉ. सत्य प्रकाश ने जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. बुद्धिराम ने किया।
प्रो. सुरेश चन्द्र के साहित्यिक योगदान पर हुई विस्तृत चर्चा
वक्ताओं ने कहा कि प्रो. सुरेश चन्द्र का साहित्य दलित विमर्श को नई दिशा देने वाला है। मुख्य अतिथि श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा कि सुरेश चन्द्र ने पहली बार दलित शब्द और दलित विमर्श का व्यवस्थित इतिहास प्रस्तुत किया। वहीं पूज्य भन्ते शासन पाल ने उनके साहित्य को मानवता और सामाजिक समरसता का रचनात्मक दस्तावेज बताया।
डॉ. बी.पी. नलिन ने डॉ. आंबेडकर की विचारधारा के आलोक में प्रो. सुरेश चन्द्र के साहित्य का मूल्यांकन किया। डॉ. सच्चिदानन्द प्रेमी ने कहा कि उनका साहित्य समाज को जोड़ने का कार्य करता है और वर्तमान समय में ऐसे साहित्य की आवश्यकता पहले से अधिक है। लेखक हिमांशु शेखर ने प्रो. सुरेश चन्द्र के नाटक ‘दलितों के सूर्य’ को मानवतावादी मूल्यों का सशक्त साहित्यिक दस्तावेज बताया।
पुस्तकों का हुआ लोकार्पण
संगोष्ठी के दौरान प्रो. सुरेश चन्द्र के चर्चित नाटक ‘दलितों के सूर्य’ के तृतीय संस्करण का लोकार्पण किया गया। इसके साथ ही डॉ. रुद्र चरण माझी एवं हरिराम द्वारा संपादित पुस्तक ‘दलित साहित्य के विकास में सुरेश चन्द्र का योगदान’ का भी विमोचन किया गया।
देशभर के विद्वानों ने रखे विचार
दो दिवसीय संगोष्ठी के विभिन्न अकादमिक सत्रों में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों से आए विशेषज्ञों ने दलित साहित्य, डॉ. आंबेडकर के विचारों और समकालीन साहित्य पर अपने शोधपत्र एवं विचार प्रस्तुत किए। कार्यक्रम में बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और राजस्थान सहित कई राज्यों के शिक्षाविदों एवं शोधार्थियों की सक्रिय भागीदारी रही।
आयोजन में कई लोगों का रहा योगदान
आयोजकों ने संगोष्ठी की सफलता का श्रेय आयोजन समिति, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं स्वयंसेवकों को दिया। कार्यक्रम के सफल संचालन में सुश्री प्रियम्वदा, विवेक कुमार, उमेश आजाद, रामावतार शास्त्री, रूपराम दास, रमेश रविदास, रामजी प्रसाद, राजेश बौद्ध, सुधीर रजक सहित कई लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
