नवरात्रि सप्तमी : मां कालरात्रि की उपासना

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आर्यावर्त वाणी विशेष लेख

मां कालरात्रि का स्वरूप

नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। इनका स्वरूप अत्यंत उग्र और भयावह दिखता है, किंतु ये सदैव अपने भक्तों को अभय और शुभ फल प्रदान करती हैं। मां का रंग श्यामवर्ण है, बाल बिखरे हुए हैं और गले में विद्युत्-सी चमकती माला है। ये गधे पर सवार रहती हैं और इनके चार हाथ हैं।

👉पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब असुरों का अत्याचार चरम पर था तब देवी ने कालरात्रि का रूप धारण कर दुष्टों का संहार किया। मां का यह रूप भक्तों के सभी भय, कष्ट और पापों का नाश करता है। इन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है क्योंकि ये अपने भक्तों को सदैव शुभ फल देती हैं।

👉पूजन-विधि

1️⃣ प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें।
2️⃣ मां कालरात्रि की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
3️⃣ कलश स्थापना कर उसके समीप घी का दीपक जलाएँ।
4️⃣ गंगाजल से शुद्धिकरण कर संकल्प लें।
5️⃣ मां को 🌹 लाल फूल, धूप और काली मिर्च अर्पित करें।
6️⃣ गुड़ या jaggery का भोग लगाएँ।
7️⃣ मंत्र का जाप करें – “ॐ देवी कालरात्र्यै नमः”।
8️⃣ दुर्गा सप्तशती, कालरात्रि स्तोत्र या देवी कवच का पाठ करें।
9️⃣ अंत में आरती कर प्रसाद वितरित करें।

👉भोग का महत्व

मां कालरात्रि को गुड़ का भोग विशेष प्रिय है। इसे अर्पित करने से साधक के जीवन से नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं और सुख-समृद्धि आती है।

👉उपासना का महत्व

✳️मां कालरात्रि की पूजा से भय, रोग और शत्रुओं का नाश होता है।
✳️ साधक के जीवन में साहस और आत्मबल की वृद्धि होती है।
✳️नकारात्मक ऊर्जाएँ दूर होकर घर-परिवार में सकारात्मक वातावरण बनता है।
✳️ मां की कृपा से अचानक होने वाली दुर्घटनाओं और बाधाओं से रक्षा होती है।

👉आज का शुभ मुहूर्त (28 सितम्बर 2025)

✳️सप्तमी तिथि प्रारंभ : 27 सितम्बर, सुबह 10:19 बजे
✳️सप्तमी तिथि समाप्त : 28 सितम्बर, सुबह 08:32 बजे
✳️पूजा का श्रेष्ठ समय : प्रातः 06:15 बजे से 09:01 बजे तक

नवरात्रि का सातवाँ दिन भय पर विजय और साहस का प्रतीक है। मां कालरात्रि की उपासना से साधक निर्भीक होकर धर्म के मार्ग पर अग्रसर होता है और जीवन की सभी कठिनाइयों से मुक्ति पाता है।

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