नवरात्रि चतुर्थी : मां कूष्मांडा की उपासना

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आर्यावर्त वाणी विशेष लेख

मां कूष्मांडा का स्वरूप

नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा का विधान है। इन्हें ब्रह्मांड की सृजनकर्ता माना जाता है। मान्यता है कि मां ने अपनी मंद मुस्कान से अंडज ब्रह्मांड की रचना की, इसलिए इन्हें कूष्मांडा कहा जाता है।
मां का स्वरूप तेजस्वी है, इनके आठ हाथ हैं और सिंह पर सवार रहती हैं।

👉पौराणिक कथा

देवी पुराण के अनुसार, जब ब्रह्मांड चारों ओर अंधकारमय था, तब मां कूष्मांडा ने अपने तेज और मुस्कान से ब्रह्मांड की सृष्टि की। उन्होंने ही सूर्य मंडल में निवास कर समस्त संसार को ऊर्जा प्रदान की। इसलिए इन्हें आदिशक्ति भी कहा जाता है।

👉 पूजन-विधि

1️⃣ प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें।
2️⃣ मां कूष्मांडा की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करें।
3️⃣ कलश स्थापना कर उसके समीप दीपक जलाएँ।
4️⃣ गंगाजल से शुद्धिकरण कर संकल्प लें।
5️⃣ मां को  गेंदा और गेंदे के पुष्प चढ़ाएँ।
6️⃣ मालपुआ या मीठे व्यंजन का भोग लगाएँ।
7️⃣ मंत्र का जाप करें – “ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः”।
8️⃣ दुर्गा सप्तशती, देवी कवच या स्तोत्र का पाठ करें।
9️⃣ अंत में आरती कर प्रसाद बाँटें।

✳️मां कूष्मांडा की पूजा से जीवन में नई ऊर्जा और सृजनात्मकता आती है।
✳️आयु, यश और धन की प्राप्ति होती है।
✳️रोग और शारीरिक कष्ट दूर होते हैं।
✳️साधक को तेज, ओज और आत्मबल प्राप्त होता है।

👉भोग का महत्व

मां कूष्मांडा को मीठे व्यंजन विशेष प्रिय हैं। मालपुआ का भोग लगाने से बुद्धि, स्मृति और निर्णय क्षमता में वृद्धि होती है।

👉उपासना का महत्व

👉आज का शुभ मुहूर्त (25 सितम्बर 2025)

✳️चतुर्थी तिथि प्रारंभ : 24 सितम्बर, दोपहर 03:46 बजे
✳️चतुर्थी तिथि समाप्त : 25 सितम्बर, दोपहर 01:56 बजे
✳️पूजा का श्रेष्ठ समय : प्रातः 06:13 बजे से 08:55 बजे तक

नवरात्रि का चौथा दिन सृजन और ऊर्जा का प्रतीक है। मां कूष्मांडा की उपासना से साधक को शक्ति, स्वास्थ्य और दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। उनकी कृपा से जीवन में सकारात्मकता और प्रगति के मार्ग खुलते हैं।

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