सूक्ष्म अवलोकन और वैज्ञानिक जिज्ञासा ही सार्थक अनुसंधान के आधार : पद्मश्री प्रो. आर.के. सिन्हा
आर्यावर्त वाणी | गयाजी | 31 अक्टूबर 2026,
गयाजी। वैज्ञानिक अनुसंधान में नई खोजों और नवाचार के लिए जिज्ञासा, सूक्ष्म अवलोकन और विश्लेषण की क्षमता बेहद जरूरी है। शोधकर्ताओं को अपने आसपास होने वाली घटनाओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने और उनमें छिपी समस्याओं की पहचान करने की कोशिश करनी चाहिए। ये बातें पद्मश्री प्रो. रवीन्द्र कुमार सिन्हा ने दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र में कहीं।
विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग की ओर से ‘इमर्जिंग एनवायरनमेंटल चैलेंजेज जैपर्डाइजिंग पब्लिक हेल्थ: पॉलिसी इंटरवेंशन्स फॉर रेजिलिएंट सोसाइटीज’ (EECH-PIRS 2026) विषय पर आयोजित इस सम्मेलन में देश-विदेश के विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने पर्यावरण से जुड़ी समकालीन चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया।
युवा शोधार्थियों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने की सलाह
मुख्य अतिथि पद्मश्री प्रो. आर.के. सिन्हा ने कहा कि सावधानीपूर्वक अवलोकन और वैज्ञानिक जिज्ञासा सार्थक अनुसंधान के मूल आधार हैं। सूक्ष्म अवलोकन से ही अक्सर वैज्ञानिक समस्याओं की पहचान होती है, जो आगे चलकर शोध, वित्तपोषण के अवसरों और नई खोजों का रास्ता खोलती हैं।
श्री माता वैष्णो देवी विश्वविद्यालय, कटरा और नालंदा खुला विश्वविद्यालय, पटना के पूर्व कुलपति प्रो. सिन्हा ने युवा शोधार्थियों को अपने आसपास की घटनाओं का अवलोकन और विश्लेषण करने की आदत विकसित करने की सलाह दी। उन्होंने आयोजन समिति की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह के सम्मेलन विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों को एक मंच पर लाने और ज्ञान के आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं।
गंगा डॉल्फिन संरक्षण के अनुभव किए साझा
‘भारत के डॉल्फिन मैन’ के नाम से प्रसिद्ध प्रो. आर.के. सिन्हा ने अपने अनुसंधान और नवाचार की यात्रा साझा करते हुए गंगा नदी की डॉल्फिन के संरक्षण के क्षेत्र में किए गए अपने अग्रणी कार्यों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक चुनौती को खोज और नवाचार के अवसर के रूप में देखना चाहिए।
उन्होंने शोधकर्ताओं से सम्मेलन के दौरान प्राप्त ज्ञान, विचारों और सहयोग का व्यावहारिक उपयोग करने तथा भविष्य में सामने आने वाली चुनौतियों के समाधान के लिए तैयार रहने का आह्वान किया। साथ ही पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान में वैज्ञानिक अनुसंधान, जन-जागरूकता और प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता पर जोर दिया।
वायु प्रदूषण से लेकर जैव विविधता संरक्षण तक हुई चर्चा
विश्वविद्यालय के जनसंपर्क पदाधिकारी (पीआरओ) मोहम्मद मुदस्सीर आलम ने बताया कि सम्मेलन के समापन सत्र में डॉ. प्रशांत ने विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसमें तकनीकी सत्रों, मुख्य व्याख्यानों, आमंत्रित व्याख्यानों, पोस्टर प्रस्तुतियों और वैज्ञानिक चर्चाओं के प्रमुख निष्कर्षों को शामिल किया गया।
सम्मेलन में वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, जल की कमी, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता संरक्षण, पर्यावरणीय न्याय, खाद्य सुरक्षा, अपशिष्ट प्रबंधन, विकिरण एवं पर्यावरण, खनन के प्रभाव और पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्स्थापन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई।
उत्कृष्ट शोधार्थियों को किया गया सम्मानित
समापन सत्र के दौरान विशिष्ट वक्ताओं, सत्र अध्यक्षों, विशेषज्ञों और अन्य योगदानकर्ताओं को उनके सहयोग एवं सहभागिता के लिए सम्मानित किया गया। वहीं, वैज्ञानिक योगदान और अनुसंधान में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को श्रेष्ठ मौखिक एवं पोस्टर प्रस्तुतियों के लिए प्रमाण-पत्र और पुरस्कार प्रदान किए गए।
इस अवसर पर प्रो. रिजवानुल हक, अधिष्ठाता, एसईबीईएस एवं सम्मेलन के संरक्षक, प्रो. राजेश कुमार रंजन, विभागाध्यक्ष, पर्यावरण विज्ञान विभाग एवं सम्मेलन संयोजक, डॉ. निंगोम्बम लिंथोइंगाम्बी देवी, सह-संयोजक तथा आयोजन सचिव डॉ. प्रशांत और डॉ. सोमा गिरी उपस्थित रहे।
सम्मेलन की आयोजन समिति ने सभी विशेषज्ञों, प्रतिनिधियों, प्रायोजक संस्थाओं, सहयोगी संस्थानों, स्वयंसेवकों एवं कर्मचारियों के प्रति आभार व्यक्त किया। अंत में डॉ. सोमा गिरी के धन्यवाद ज्ञापन और सामूहिक राष्ट्रगान के साथ तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का समापन हुआ।
इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ने पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार, जन-जागरूकता और नीतिगत सहयोग की आवश्यकता को एक बार फिर रेखांकित किया।
