मखाना उत्पादन में बिहार की बड़ी उपलब्धि, दुनिया के 80% से अधिक मखाने का उत्पादन राज्य में: कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा
आर्यावर्त वाणी | गयाजी | 07 अगस्त 2026,
गयाजी। दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी), गयाजी के कृषि विभाग एवं शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार की भारतीय भाषा समिति के संयुक्त तत्वावधान में ‘भारतीय भाषा पारितंत्र का निर्माण : कृषि विज्ञान के कार्यक्रमों एवं पाठ्यक्रमों का मानचित्रण’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय प्रारंभिक कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम में बिहार के कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।
कार्यशाला में कृषि शिक्षा, भारतीय भाषाओं, पारंपरिक ज्ञान और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप पाठ्यक्रमों के विकास पर देशभर से आए विशेषज्ञों एवं शिक्षाविदों ने विचार-विमर्श किया।
कृषि विज्ञान में भारतीय ज्ञान परंपरा को शामिल करने पर जोर
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि कृषि विज्ञान सहित विज्ञान की विभिन्न शाखाओं में भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेश समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारत का ज्ञान भारतीय भाषाओं में निहित है। इसलिए भारतीय भाषाओं का समान रूप से विकास, विस्तार तथा शिक्षण-प्रशिक्षण में उनका उपयोग सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।
उन्होंने कहा कि विषयों को पढ़ाते समय भी भाषाई स्वतंत्रता आवश्यक है। कृषि शिक्षा में पारंपरिक भारतीय शब्दावली को स्थान देने की जरूरत है।
‘रबी-खरीफ’ की जगह पारंपरिक शब्दावली अपनाने की अपील
कृषि मंत्री ने कहा कि भारतीय समाज लंबे समय से ‘वसंत’ एवं ‘शारदीय फसल’ जैसे पारंपरिक शब्दों का उपयोग करता आया है, जबकि ‘रबी’ और ‘खरीफ’ शब्दावली बाहरी प्रभाव से आई है। उन्होंने कृषि के विद्यार्थियों से कृषि से जुड़े पारंपरिक शब्दों के प्रयोग की शुरुआत करने तथा उन्हें पाठ्यक्रम में शामिल करने की दिशा में प्रयास करने का आह्वान किया।
बिहार दुनिया के 80 प्रतिशत से अधिक मखाने का उत्पादन करता है: मंत्री
कृषि मंत्री ने बिहार की कृषि उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि बिहार संपूर्ण विश्व के 80 प्रतिशत से अधिक मखाने का उत्पादन करता है। उन्होंने बताया कि मखाने की पहली खेप में सात कंटेनर ऑस्ट्रेलिया पहुंच चुके हैं।
उन्होंने कहा कि बड़े पैमाने पर मखाना उत्पादन यह दर्शाता है कि केंद्र सरकार की मखाना संवर्धन नीति से इसकी खेती को बढ़ावा मिला है और बिहार के किसानों के लिए मखाना एक महत्वपूर्ण कृषि उत्पाद के रूप में उभर रहा है।
‘भारत और भारतीय भाषा पर गर्व होना चाहिए’
मंत्री ने भारतीय संस्कृति और परंपरा पर जोर देते हुए कहा कि जिस व्यक्ति को अपने देश और अपनी भाषा पर गर्व एवं गौरव नहीं है, उसके लिए यह चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि जब शिक्षा भारतीयता से जुड़ेगी, तभी भारत विकसित होगा।
उन्होंने भारतीय संस्कृति की व्यापक दृष्टि का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय परंपरा केवल मानव जाति के कल्याण की बात नहीं करती, बल्कि सभी जीवों के कल्याण की भावना रखती है। इसी व्यापक सोच से ‘वसुधैव कुटुंबकम’ जैसी अवधारणा विकसित हुई है।
कृषि शिक्षा के भारतीयकरण पर खुलकर हो संवाद
कृषि मंत्री ने कार्यशाला में विशेषज्ञों से खुलकर संवाद करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इस बात पर गंभीरता से चर्चा होनी चाहिए कि कृषि के पाठ्यक्रमों का भारतीयकरण किस प्रकार किया जाए और भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप कृषि को कैसे विकसित किया जाए।
उन्होंने नई पीढ़ी की जिज्ञासु प्रवृत्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि खासकर 1990 के दशक के बाद की पीढ़ी सवाल पूछ रही है और नई चीजों को समझना चाहती है। ऐसे में समाज और शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वे युवाओं के साथ प्रभावी संवाद स्थापित कर उनकी जिज्ञासाओं का समाधान करें।
कृषि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं: कुलपति
सीयूएसबी के कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह ने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि विश्वविद्यालय में कृषि विज्ञान का पाठ्यक्रम शुरू करने का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को प्रमाणपत्र, डिप्लोमा या डिग्री प्रदान करना नहीं है, बल्कि किसानों के लिए सफल प्रयोग स्थापित करना और एक ऐसा मॉडल विकसित करना है, जिससे कैंपस के साथ आसपास की कम्युनिटी भी समृद्ध हो सके।
उन्होंने कहा कि किसी विश्वविद्यालय की सार्थकता तभी है, जब वह समाज के लिए कुछ ठोस कार्य करे। विकसित भारत और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए आत्मनिर्भर विश्वविद्यालय भी आवश्यक हैं और सीयूएसबी इसी दिशा में लगातार प्रयास कर रहा है।
गयाजी में कृषि विकास की योजनाओं की दी जानकारी
कार्यक्रम में गयाजी के जिलाधिकारी शशांक शुभंकर ने भी कृषि के क्षेत्र में अपने विचार रखे। उन्होंने गयाजी जिले में कृषि विकास के लिए संचालित विभिन्न योजनाओं एवं प्रयासों की जानकारी दी तथा कृषि क्षेत्र को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
देशभर के कृषि विशेषज्ञों ने लिया हिस्सा
दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में देश के विभिन्न केंद्रीय एवं राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के संस्थानों तथा अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों से आए विषय विशेषज्ञों, शिक्षाविदों एवं कृषि वैज्ञानिकों ने सहभागिता की।
तकनीकी सत्र में भारतीय भाषा समिति के शैक्षणिक समन्वयक डॉ. चंदन श्रीवास्तव ने कृषि विज्ञान के स्नातक एवं स्नातकोत्तर कार्यक्रमों के पाठ्यक्रम, विषय, तकनीकी शब्दावली और संदर्भ पुस्तकों को भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने के लिए प्रस्तावित मानचित्रण की विस्तृत कार्ययोजना प्रस्तुत की।
भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा के विस्तार पर जोर
भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार की संयुक्त सचिव डॉ. रचना विश्वकर्मा ने भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा के विस्तार तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए समिति द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डाला।
विशेषज्ञों ने भारतीय भाषाओं में कृषि शिक्षा, पाठ्यक्रमों एवं संदर्भ पुस्तकों के मानचित्रण, तकनीकी शब्दावली के मानकीकरण तथा एनईपी-2020 के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री विकसित करने को लेकर अपने सुझाव साझा किए।
अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत
कार्यक्रम के समन्वयक डॉ. हेमंत कुमार सिंह ने अतिथियों एवं विशेषज्ञों का स्वागत करते हुए कार्यशाला के उद्देश्यों और रूपरेखा की जानकारी दी। आयोजन सचिव डॉ. ए. विश्वास ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के डीन (कृषि) डॉ. ए.पी. सिंह, कुलानुशासक, डीन छात्र कल्याण, विभिन्न कायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षकगण, शोधार्थी, छात्र-छात्राएं, प्रशासनिक अधिकारी तथा बड़ी संख्या में प्रतिभागी उपस्थित रहे।
