दार्जिलिंग हिमालय में भूस्खलन – बाढ़ पर सीयूएसबी का बड़ा शोध प्रकाशित, 494 भूस्खलनों का खुलासा

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आर्यावर्त वाणी | गयाजी | 02 अप्रैल 2026,

गयाजी; दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) के शोधकर्ताओं ने दार्जिलिंग हिमालय में अक्टूबर 2025 में हुई भीषण वर्षा से उत्पन्न भूस्खलन और फ्लैश फ्लड पर महत्वपूर्ण अध्ययन प्रकाशित किया है। अंतरराष्ट्रीय जर्नल में छपे इस शोध में आपदा के बहु-खतरा स्वरूप और उसके व्यापक प्रभावों को रेखांकित किया गया है।

शोध को मिला अंतरराष्ट्रीय मान्यता

दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) के भूगोल विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. सोमनाथ बेरा के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त जर्नल लैंडस्लाइड्स (स्प्रिंगर नेचर) में प्रकाशित किया गया है। यह जर्नल उच्च श्रेणी (क्यू-1) और 7.5 इम्पैक्ट फैक्टर वाला माना जाता है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस उपलब्धि पर शोध टीम को बधाई दी है।

अत्यधिक वर्षा से पैदा हुई आपदा

अध्ययन के अनुसार, 4–5 अक्टूबर 2025 को दार्जिलिंग – सिक्किम हिमालय क्षेत्र में मात्र 24 घंटों में 250–400 मिमी तक वर्षा दर्ज की गई। इस अत्यधिक वर्षा ने व्यापक भूस्खलन और आकस्मिक बाढ़ को जन्म दिया। यह घटना 1968 की विनाशकारी आपदा के बाद सबसे गंभीर मानी जा रही है।

494 भूस्खलनों की पहचान

शोध में दार्जिलिंग के रंगभंग बेसिन क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया गया, जहां उच्च-रिज़ॉल्यूशन उपग्रह चित्रों और फील्ड सर्वे के आधार पर कुल 494 भूस्खलनों की पहचान की गई। इनमें से 455 भूस्खलन इसी घटना के दौरान 65 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में नए सिरे से उत्पन्न हुए। इनमें उथले मलबा भूस्खलन और तेज बहाव वाले मलबा प्रवाह प्रमुख रूप से शामिल हैं।

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बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था पर असर

अध्ययन में पाया गया कि इस आपदा ने बुनियादी ढांचे और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाला।

🔹56 से अधिक स्थानों पर सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं
🔹92 भवन भूस्खलन से प्रभावित हुए
🔹फ्लैश फ्लड से 106 भवन और 5 पुल क्षतिग्रस्त हुए
🔹80 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि प्रभावित हुई, जिसमें लगभग 69% हिस्सा चाय बागानों का था

बहु-खतरा आपदा का स्वरूप

शोध में यह स्पष्ट किया गया है कि यह केवल भूस्खलन या बाढ़ की अलग-अलग घटना नहीं थी, बल्कि एक “मल्टी-हैज़र्ड चेन” थी। भूस्खलनों से निकला मलबा नदियों में पहुंचकर बाढ़ की तीव्रता और विनाश को और बढ़ाता है। सियोक और ताबा कोशी क्षेत्रों के अध्ययन से पता चलता है कि मलबा प्रवाह और नदी चैनल के विस्तार ने बस्तियों, पर्यटन स्थलों और परिवहन नेटवर्क को गंभीर नुकसान पहुंचाया।

भविष्य के लिए सुझाव

मुख्य शोधकर्ता डॉ. सोमनाथ बेरा के अनुसार, इस अध्ययन का उद्देश्य भविष्य में आपदा प्रबंधन को मजबूत बनाना है।
शोध में सुझाव दिया गया है कि:
🔹बेहतर निकासी (एवैक्युएशन) योजना बनाई जाए
🔹अवसंरचना को अधिक सुदृढ़ किया जाए
🔹नदी किनारे और संवेदनशील क्षेत्रों में विकास को नियंत्रित किया जाए।

यह अध्ययन दर्शाता है कि अल्प अवधि की अत्यधिक वर्षा हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर भूस्खलन और बाढ़ का कारण बन सकती है। ढलान, ऊंचाई और भूमि उपयोग जैसे कारकों में चाय बागान क्षेत्र विशेष रूप से अधिक संवेदनशील पाए गए हैं। यह शोध भविष्य में आपदा तैयारी और जोखिम कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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