तिरंगे में लिपटकर घर लौटा मां का लाल, अग्निवीर सुभाष को अंतिम विदाई देते वक्त छलक पड़े पिता के आंसू
आर्यावर्त वाणी | गयाजी | 14 अक्टूबर 2026
गयाजी। जिस बेटे को पिता ने सीने से लगाकर पाला, जिस मां ने हजारों सपने संजोकर उसे देश की सेवा के लिए सेना की वर्दी में विदा किया था, वही बेटा बुधवार को तिरंगे में लिपटकर घर लौटा। गयाजी जिले के बांकेबाजार प्रखंड अंतर्गत जमवारार खुर्द गांव के 22 वर्षीय अग्निवीर जवान सुभाष कुमार चौधरी के निधन की खबर ने पूरे गांव को गमगीन कर दिया। राजस्थान के जैसलमेर में ड्यूटी के दौरान तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अजमेर के अस्पताल में भर्ती कराया गया था। करीब डेढ़ सप्ताह तक जिंदगी और मौत के बीच जूझने के बाद आखिरकार सुभाष जिंदगी की जंग हार गए।
बुधवार को जब उनका पार्थिव शरीर पैतृक गांव पहुंचा, तो हर आंख नम हो गई। तिरंगे में लिपटे बेटे को सामने देखकर पिता गया चौधरी की नजरें बार-बार अपने लाल पर ठहर जा रही थीं। आंखों में आंसू थे और दिल में ऐसे दर्द का सैलाब, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। गांव के लोगों के लिए भी यह दृश्य बेहद भावुक कर देने वाला था। जिस सुभाष को कुछ दिन पहले तक देश की सेवा में समर्पित एक जवान के रूप में देखा जाता था, आज उसी को अंतिम विदाई देने के लिए पूरा गांव उमड़ पड़ा था।
पिता की आंखों में आंसू, मां की उम्मीदें और परिवार का उजड़ता संसार
बेटे को खोने का दर्द क्या होता है, यह उस पिता की आंखों में साफ झलक रहा था, जो तिरंगे में लिपटे अपने बेटे को बार-बार निहार रहा था। पिता गया चौधरी के लिए यह विश्वास करना भी मुश्किल था कि जिस बेटे से कुछ दिन पहले फोन पर बात हुई थी, वह अब कभी घर लौटकर उनसे बात नहीं करेगा।
पिता ने भावुक होकर बताया कि ड्यूटी के दौरान अचानक बेटे की तबीयत बिगड़ गई थी। कई दिनों तक अस्पताल में उसका इलाज चला, लेकिन आखिरकार उसे बचाया नहीं जा सका। उन्होंने कहा कि बेटे की मौत से उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है।
परिजनों के लिए सबसे पीड़ादायक वह आखिरी बातचीत है, जिसमें सुभाष ने अपने पिता से कहा था, “पापा, सब ठीक है। आप लोग ठीक से रहिएगा।” उसने अपनी मां से भी बात की थी। उस वक्त परिवार को क्या पता था कि बेटे की आवाज की ये यादें ही अब उसके साथ जुड़ी आखिरी अनमोल निशानी बनकर रह जाएंगी। इसके बाद अचानक तबीयत बिगड़ने की खबर आई और फिर उसके निधन की सूचना ने पूरे परिवार को भीतर तक झकझोर दिया।
ड्यूटी के दौरान बिगड़ी थी तबीयत, अजमेर में चला इलाज
परिजनों से मिली जानकारी के अनुसार, सुभाष कुमार चौधरी झांसी से जैसलमेर जा रहे सेना के काफिले के साथ ड्यूटी पर थे। इसी दौरान पाइप के माध्यम से डीजल खींचने के क्रम में डीजल उनके मुंह के रास्ते पेट में चला गया, जिसके बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई।
उन्हें उपचार के लिए अजमेर के अस्पताल में भर्ती कराया गया। हालत गंभीर होने के कारण उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया और करीब डेढ़ सप्ताह तक इलाज चला। परिवार को उम्मीद थी कि उनका बेटा स्वस्थ होकर लौटेगा और एक बार फिर घर-आंगन में खुशियां लौटेंगी। लेकिन तमाम उम्मीदों के बीच सुभाष ने अंतिम सांस ले ली। महज 22 वर्ष की उम्र में उनका इस दुनिया से चले जाना परिवार के लिए ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।
गया एयरपोर्ट से गांव पहुंचा पार्थिव शरीर, उमड़ पड़ा जनसैलाब
सुभाष का पार्थिव शरीर गया एयरपोर्ट से सेना के वाहन के माध्यम से उनके पैतृक गांव जमवारार खुर्द लाया गया। जैसे ही पार्थिव शरीर गांव पहुंचा, अंतिम दर्शन के लिए ग्रामीणों की भीड़ जुट गई। लोगों ने पुष्प अर्पित कर वीर जवान को श्रद्धांजलि दी। सेना के अधिकारियों ने भी उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए।
हर तरफ गम का माहौल था। किसी की आंखों में आंसू थे, तो कोई परिवार को ढांढस बंधाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन बेटे को खो चुके पिता के दर्द को कम करने के लिए किसी के पास शब्द नहीं थे। गांव की मिट्टी में पले-बढ़े सुभाष को अंतिम विदाई देने के लिए उमड़े लोगों की आंखें भी बार-बार नम हो रही थीं।
‘भारत माता की जय’ और ‘वीर जवान सुभाष अमर रहें’ के नारों के बीच अंतिम विदाई
अग्निवीर सुभाष कुमार चौधरी को सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। इस दौरान ‘भारत माता की जय’ और ‘वीर जवान सुभाष अमर रहें’ के नारों से माहौल गूंज उठा। तिरंगे में लिपटे सुभाष को विदा करते समय लोगों के मन में गर्व के साथ गहरा दुख भी था।
एक ओर देश की सेवा के लिए सेना में शामिल हुए जवान के प्रति सम्मान था, तो दूसरी ओर उस परिवार के प्रति संवेदना, जिसने अपना जवान बेटा खो दिया। सुभाष के जाने से उनके माता-पिता ने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा खो दिया है।
पीछे रह गईं यादें, अधूरे सपने और अपनों की आंखों में आंसू
सुभाष कुमार चौधरी अब अपने परिवार के बीच नहीं हैं। उनके माता-पिता के लिए बेटे की आवाज, उससे हुई आखिरी बातचीत और उससे जुड़ी यादें ही अब जीवन की अनमोल धरोहर हैं। जिस घर में बेटे के लौटने की उम्मीद थी, वहां अब उसकी तस्वीर और यादें परिवार को उसकी कमी का एहसास कराती रहेंगी।
22 साल की उम्र में सुभाष का इस तरह चले जाना सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि पूरे गांव के लिए गहरी पीड़ा का क्षण है। सैन्य सम्मान के साथ दी गई उनकी अंतिम विदाई ने हर किसी को भावुक कर दिया।
कुछ विदाइयां ऐसी होती हैं, जिनमें शब्द कम पड़ जाते हैं और आंसू बहुत कुछ कह जाते हैं। सुभाष तिरंगे में लिपटकर घर जरूर लौटे, लेकिन अपने माता-पिता की जिंदगी से वह खुशी हमेशा के लिए छीन गई, जिसका इंतजार उन्हें हर दिन रहता था।
