इंडोनेशिया में गूंजी सीयूएसबी की शोध की आवाज, निशी श्रीवास्तव को ‘बेस्ट प्रेजेंटर’ अवॉर्ड
आर्यावर्त वाणी | गयाजी | 24 अगस्त 2026
गयाजी: दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) के मनोवैज्ञानिक विज्ञान विभाग की शोधार्थी निशी श्रीवास्तव ने इंडोनेशिया के बाली में आयोजित 11वें वर्ल्ड डिसएबिलिटी एंड रिहैबिलिटेशन कॉन्फ्रेंस (WDRC 2026) में शोध-पत्र प्रस्तुत कर विश्वविद्यालय का गौरव बढ़ाया। अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन दि इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ नॉलेज मैनेजमेंट (TIIKM) की ओर से किया गया था।
प्रो. चेतना जायसवाल के मार्गदर्शन में निशी ने दुनिया के विभिन्न देशों से पहुंचे मनोवैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच अपना शोध प्रस्तुत किया।
दिव्यांगजनों के जीवन की गुणवत्ता और रोजगार पर केंद्रित शोध
निशी श्रीवास्तव ने ‘Psychosocial Determinants of Quality of Life Among Persons with Locomotor Disability: The Moderating Role of Employment’ विषय पर शोध-पत्र प्रस्तुत किया। शोध में लोकोमोटर दिव्यांगता वाले लोगों के जीवन की गुणवत्ता और कल्याण को प्रभावित करने वाले मनोसामाजिक कारकों का अध्ययन किया गया।
शोध में सामाजिक समावेशन, रोजगार की भूमिका और दिव्यांगजनों के लिए उपलब्ध सहायता प्रणालियों सहित उनसे जुड़े नीतिगत पहलुओं पर भी ध्यान केंद्रित किया गया। इस तरह शोध का विषय केवल अकादमिक विमर्श तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दिव्यांगजनों के बेहतर जीवन और सामाजिक भागीदारी से जुड़े व्यावहारिक सवालों को भी सामने लाता है।
शोध प्रस्तुति के लिए मिला ‘बेस्ट प्रेजेंटर’ सम्मान
सम्मेलन में निशी को ‘Mental Health and Well-Being in Disability Communities’ सत्र के लिए ‘Best Presenter’ Award से सम्मानित किया गया। अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में शोध-पत्र की प्रस्तुति के साथ यह सम्मान उनकी अकादमिक क्षमता और शोध की गुणवत्ता को दर्शाता है।
कुलपति ने दी बधाई
निशी की उपलब्धि पर सीयूएसबी के कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह ने उन्हें बधाई दी। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर शोध प्रस्तुत करना विश्वविद्यालय के लिए गौरव का विषय है। उन्होंने निशी के उज्ज्वल अकादमिक एवं शोध भविष्य की कामना की।
मनोवैज्ञानिक विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. मंगलेश कुमार मंगलम, स्कूल के डीन प्रो. धर्मेंद्र कुमार सिंह तथा विभाग के अन्य शिक्षकों ने भी निशी को बधाई दी। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह उपलब्धि विश्वविद्यालय के अन्य शोधार्थियों को भी उत्कृष्ट और समाजोपयोगी शोध के लिए प्रेरित करेगी।
