वैश्विक उथल-पुथल के दौर में भारत की भूमिका अहम, विश्व शांति के लिए भारत आज भी उम्मीद की किरण: पूर्व राजदूत अनिल त्रिगुणायत
आर्यावर्त वाणी | गयाजी | 29 जुलाई 2026,
गयाजी: दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) में “वैश्विक उथल-पुथल के दौर में भारतीय विदेश नीति कैसे चुनौतियों का सामना कर रही है?” विषय पर आयोजित विशेष व्याख्यान में भारतीय विदेश सेवा (सेवानिवृत्त) के वरिष्ठ राजनयिक एवं विभिन्न देशों में भारत के पूर्व राजदूत अनिल त्रिगुणायत ने कहा कि वर्तमान समय में वैश्विक शासन व्यवस्था गंभीर चुनौतियों से गुजर रही है। ऐसे दौर में विश्व शांति, संतुलित कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने में भारत की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
वैश्विक संस्थाओं की भूमिका पर उठाए सवाल
अपने संबोधन में पूर्व राजदूत ने कहा कि दुनिया में बदलते भू-राजनीतिक हालात, विभिन्न देशों के बीच बढ़ते संघर्ष, आर्थिक प्रतिबंध, टैरिफ विवाद और अंतरराष्ट्रीय समझौतों के कमजोर पड़ने से वैश्विक व्यवस्था प्रभावित हुई है। उन्होंने कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध तथा मध्य-पूर्व में जारी तनाव का असर केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत जैसे विकासशील देशों पर भी पड़ रहा है।
भारत की विदेश नीति संतुलन और राष्ट्रीय हित पर आधारित
श्री त्रिगुणायत ने कहा कि भारत संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों का संस्थापक सदस्य रहा है और हमेशा बहुपक्षवाद, शांति एवं वैश्विक सहयोग का समर्थक रहा है। उन्होंने कहा कि भारत की विदेश नीति का मूल उद्देश्य राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए विश्व में शांति, स्थिरता और सहयोग को बढ़ावा देना है।
उन्होंने कोविड-19 महामारी का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत ने न केवल स्वदेशी वैक्सीन विकसित की, बल्कि 100 से अधिक देशों को वैक्सीन उपलब्ध कराकर वैश्विक मानवता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का परिचय दिया। साथ ही उन्होंने पड़ोसी देशों से जुड़ी सामरिक एवं कूटनीतिक चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत इन परिस्थितियों का विवेकपूर्ण ढंग से सामना कर रहा है।
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ भारत की वैश्विक सोच का आधार
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सीयूएसबी के कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह ने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की समझ प्रत्येक नागरिक के लिए आवश्यक हो गई है। उन्होंने कहा कि भारत की मूल भावना “वसुधैव कुटुम्बकम्” पर आधारित है, जो पूरे विश्व को एक परिवार मानने का संदेश देती है।
उन्होंने कहा कि ‘विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य सरकार और देशवासियों के सामूहिक प्रयासों से ही प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए आत्मनिर्भरता, सतत विकास और राष्ट्रीय नीतियों के प्रति सकारात्मक सहभागिता आवश्यक है।
विद्यार्थियों ने पूछे समसामयिक प्रश्न
विश्वविद्यालय के जनसंपर्क पदाधिकारी मोहम्मद मुदस्सीर आलम ने बताया कि कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं अतिथियों के स्वागत के साथ हुआ। राजनीति अध्ययन विभागाध्यक्ष प्रो. प्रवीण कुमार ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि सामाजिक विज्ञान एवं नीति अध्ययन संकाय के अधिष्ठाता प्रो. प्रणव कुमार ने विषय की रूपरेखा प्रस्तुत की।
व्याख्यान के बाद विद्यार्थियों एवं शिक्षकों ने पूर्व राजदूत अनिल त्रिगुणायत से समसामयिक अंतरराष्ट्रीय मुद्दों, भारत की विदेश नीति और वैश्विक चुनौतियों से जुड़े विभिन्न प्रश्न पूछे, जिनका उन्होंने विस्तार से उत्तर दिया। कार्यक्रम का संचालन एमए राजनीति विज्ञान की छात्राओं प्राची सिंह दीक्षित एवं श्रुति राज ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अभय कुमार ने प्रस्तुत किया।
विद्यार्थियों के लिए रहा ज्ञानवर्धक व्याख्यान
कार्यक्रम में विदेश नीति, वैश्विक अर्थव्यवस्था, मानवाधिकार, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने विद्यार्थियों को बदलते वैश्विक परिदृश्य को समझने तथा भारत की रणनीतिक भूमिका पर गंभीरता से विचार करने के लिए प्रेरित किया।
