सीयूएसबी का शोध: खेल बन सकते हैं सामाजिक-आर्थिक प्रगति का सशक्त माध्यम

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आर्यावर्त वाणी | गयाजी | 05 अप्रैल 2026

गयाजी; दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) के समाजशास्त्रीय अध्ययन विभाग की प्रो. समापिका महापात्रा के नेतृत्व में किए गए शोध को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका स्पोर्ट टीके–यूरोअमेरिकन जर्नल ऑफ स्पोर्ट साइंसेज़ में प्रकाशित किया गया है, जो स्कोपस और वेब ऑफ साइंस में सूचीबद्ध है।
इस अध्ययन में शोधार्थी शालू सिन्हा और सोनू प्रसाद ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

582 शोध लेखों का विश्लेषण

अध्ययन में बिब्लियोमेट्रिक पद्धति के तहत 1992 से 2023 तक के 582 शोध लेखों का विश्लेषण किया गया। इसमें कीवर्ड सह-अवस्थिति (co-occurrence) और लेखक सह-उद्धरण (co-citation) जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग किया गया, जिससे खेल, स्वास्थ्य और सामाजिक गतिशीलता के बीच गहरे संबंधों की पहचान हुई।

खेल से मिलती है सामाजिक-आर्थिक गति

शोध के अनुसार, खेल समावेशी विकास और आर्थिक सशक्तिकरण का प्रभावी माध्यम बन सकते हैं, खासकर वंचित वर्ग के युवाओं के लिए। खेलों के माध्यम से न केवल रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, बल्कि सामाजिक स्तर पर उन्नति के रास्ते भी खुलते हैं।

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चुनौतियां भी आईं सामने

हालांकि अध्ययन में यह भी पाया गया कि खेलों तक समान पहुंच अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। संरचनात्मक बाधाएं और संसाधनों की कमी कई प्रतिभाशाली युवाओं के आगे बढ़ने में रुकावट बनती हैं।

नीतिगत सुधार की जरूरत

प्रो. समापिका महापात्रा ने सुझाव दिया कि भारत और बिहार में खेलों को बढ़ावा देने के लिए:
🔹समावेशी सरकारी नीतियां बनाई जाएं
🔹जमीनी स्तर पर खेल बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जाए
🔹प्रशिक्षण सुविधाओं तक समान पहुंच सुनिश्चित की जाए

सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकते हैं खेल

यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि यदि सही दिशा में प्रयास किए जाएं, तो खेल केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक उन्नति का एक मजबूत आधार बन सकते हैं।

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