सीयूएसबी में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार 2026 पर विशेष व्याख्यान, आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला की खोजों पर हुई चर्चा
आर्यावर्त वाणी | गयाजी | 16 अक्टूबर 2026
गयाजी: दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) में भौतिकी विभाग तथा इंस्टीट्यूशन इनोवेशन काउंसिल (आईआईसी) के संयुक्त तत्वावधान में वर्ष 2026 के भौतिकी के नोबेल पुरस्कार पर विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह के संरक्षण में आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों और शोधार्थियों को आधुनिक भौतिकी, ब्रह्मांडीय अनुसंधान और न्यूट्रिनो विज्ञान से जुड़ी महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अवधारणाओं से परिचित कराना था।
कार्यक्रम में आईआईसी के अध्यक्ष प्रो. वेंकटेश सिंह ने मुख्य वक्ता के रूप में ‘फ्रॉम कॉस्मिक मैसेंजर टू न्यू होराइजन्स: अंडरस्टैंडिंग द 2026 नोबेल प्राइज इन फिजिक्स’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने ब्रह्मांड से आने वाले उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो और उनके अध्ययन में आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला।
‘प्रेत कण’ न्यूट्रिनो के लगभग 100 वर्षों के इतिहास की दी जानकारी
प्रो. वेंकटेश सिंह ने न्यूट्रिनो के लगभग एक शताब्दी लंबे वैज्ञानिक इतिहास को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया। न्यूट्रिनो को अक्सर ‘प्रेत कण’ कहा जाता है, क्योंकि ये पदार्थ के साथ बहुत कम अंतःक्रिया करते हैं और बड़ी मात्रा में पदार्थ से गुजरने के बावजूद इनका पता लगाना बेहद कठिन होता है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 1930 के दशक में वैज्ञानिक वोल्फगैंग पाउली ने न्यूट्रिनो की सैद्धांतिक परिकल्पना प्रस्तुत की थी। इसके बाद जेम्स चैडविक और एनरिको फर्मी के प्रारंभिक वैज्ञानिक कार्यों ने इस क्षेत्र की समझ को आगे बढ़ाने में योगदान दिया। न्यूट्रिनो के अध्ययन ने वैज्ञानिकों को परमाणु प्रक्रियाओं और ब्रह्मांड में होने वाली अत्यधिक ऊर्जावान घटनाओं को समझने के नए रास्ते दिए हैं।
सूर्य से निकलने वाले न्यूट्रिनो की गति और विशेषताओं पर चर्चा
व्याख्यान के दौरान प्रो. सिंह ने न्यूट्रिनो की विशिष्ट प्रकृति को समझाते हुए बताया कि प्रत्येक सेकंड पृथ्वी के हर वर्ग सेंटीमीटर क्षेत्र से लगभग 60 अरब सौर न्यूट्रिनो गुजरते हैं। सूर्य के केंद्र में उत्पन्न होने वाले फोटॉनों को सूर्य के भीतर से सतह तक पहुंचने में अत्यधिक लंबा समय लग सकता है, जबकि न्यूट्रिनो पदार्थ के साथ बहुत कम अंतःक्रिया करने के कारण अपेक्षाकृत कम समय में सूर्य से बाहर निकल जाते हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यूट्रिनो का अध्ययन वैज्ञानिकों को सूर्य के आंतरिक भाग में होने वाली प्रक्रियाओं की जानकारी हासिल करने में मदद करता है। यही विशेषताएं इन्हें आधुनिक खगोल भौतिकी और कण भौतिकी के अनुसंधान में महत्वपूर्ण बनाती हैं।
अंटार्कटिका की बर्फ में स्थापित आइसक्यूब वेधशाला की कार्यप्रणाली समझाई
व्याख्यान का प्रमुख केंद्र आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला रही। प्रो. सिंह ने बताया कि अंटार्कटिका के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में बर्फ के भीतर स्थापित यह विशाल वैज्ञानिक परियोजना उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो का पता लगाने के लिए विकसित की गई है। इसके निर्माण में लगभग सात वर्ष लगे और इसकी परिकल्पना प्रो. फ्रांसिस लुई हाल्जेन से जुड़ी है।
वेधशाला में बर्फ के भीतर लगभग 2.5 किलोमीटर की गहराई तक स्थापित 5,000 से अधिक डिजिटल प्रकाशीय मॉड्यूल अत्यंत सूक्ष्म प्रकाश संकेतों को दर्ज करते हैं। जब न्यूट्रिनो बर्फ में मौजूद अन्य कणों के साथ अंतःक्रिया करते हैं, तो उत्पन्न आवेशित कणों से चेरेनकोव विकिरण के रूप में नीली रोशनी पैदा हो सकती है। प्रकाश संवेदक इस रोशनी को दर्ज करके न्यूट्रिनो से जुड़ी जानकारी जुटाने में मदद करते हैं।
इस तकनीक के माध्यम से वैज्ञानिक उन दुर्लभ घटनाओं का अध्ययन कर सकते हैं, जिनका सीधा अवलोकन पारंपरिक दूरबीनों से करना कठिन होता है।
दूरस्थ ब्रह्मांडीय घटनाओं को समझने में न्यूट्रिनो अनुसंधान की अहम भूमिका
प्रो. सिंह ने बताया कि उच्च-ऊर्जा ब्रह्मांडीय न्यूट्रिनो अंतरिक्ष में लंबी दूरी तय कर सकते हैं और रास्ते में पदार्थ तथा चुंबकीय क्षेत्रों से अपेक्षाकृत कम प्रभावित होते हैं। इस कारण वे दूरस्थ ब्रह्मांडीय स्रोतों से महत्वपूर्ण सूचनाएं लेकर आते हैं।
इनका अध्ययन वैज्ञानिकों को अतिनवीन तारों के विस्फोट, विशाल कृष्ण विवरों के आसपास होने वाली गतिविधियों और अन्य अत्यधिक ऊर्जावान खगोलीय घटनाओं के संभावित स्रोतों की पहचान करने में सहायता करता है। इस प्रकार न्यूट्रिनो वेधशालाएं ब्रह्मांड को समझने के लिए पारंपरिक खगोलीय अवलोकनों के अतिरिक्त एक महत्वपूर्ण माध्यम उपलब्ध कराती हैं।
शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने प्रश्नोत्तर सत्र में लिया भाग
विश्वविद्यालय के जनसंपर्क पदाधिकारी (पीआरओ) मोहम्मद मुदस्सीर आलम ने बताया कि कार्यक्रम के औपचारिक शुभारंभ के बाद शारीरिक शिक्षा विभाग के डॉ. राहुल सिंह ने मुख्य वक्ता और अतिथि प्राध्यापकों को सम्मानित किया। व्याख्यान के दौरान भौतिकी से जुड़ी जटिल अवधारणाओं को सरल तरीके से समझाने का प्रयास किया गया, जिससे विद्यार्थियों और शोधार्थियों को विषय की गहराई समझने का अवसर मिला।
कार्यक्रम में भौतिकी विभाग के डॉ. लखविंदर सिंह और डॉ. पुनीत मिश्रा सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे। प्रश्नोत्तर सत्र में प्रतिभागियों ने सक्रिय रूप से हिस्सा लिया और वैज्ञानिक विषयों से जुड़े सवालों पर चर्चा की।
आईआईसी टीम ने आयोजन में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
इस विशेष व्याख्यान के सफल आयोजन में इंस्टीट्यूशन इनोवेशन काउंसिल की टीम के सदस्यों शिवांगी राजपूत, स्वाति चौधरी, आस्था चांधरियावी, आयुष दत्ता, दिशांक रंजन, रंजन कुमार और हर्ष आनंद ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यक्रम ने विद्यार्थियों को आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार और ब्रह्मांड की जटिल प्रक्रियाओं को समझने के लिए प्रेरित किया।
