गैस संकट ने छीना रोज़गार का सहारा: दिल्ली से लौट रहे प्रवासी मजदूरों की बढ़ती कतार
आर्यावर्त वाणी | पटना | 23 अप्रैल 2026,
पटना: दिल्ली सहित देश के बड़े महानगरों में रसोई गैस की किल्लत अब केवल एक अस्थायी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह सीधे तौर पर प्रवासी मजदूरों के जीवन और रोज़गार को प्रभावित कर रही है। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि सैकड़ों की संख्या में मजदूर रोज़ाना दिल्ली से बिहार की ओर लौटने को मजबूर हो रहे हैं। ट्रेनों में बढ़ती भीड़ इस संकट की गवाही दे रही है।
दिल्ली से लौट रहे एक प्रवासी मजदूर सुमित बताते हैं कि उन्हें महीने भर की मेहनत के बाद लगभग 12,000 रुपये मिलते हैं, जिसमें उन्हें किराया, भोजन और अन्य आवश्यक खर्चों का प्रबंधन करना पड़ता है। लेकिन हाल के दिनों में खुदरा बाज़ार में गैस की कीमत 300 से 400 रुपए प्रति किलो के हिसाब से मिल रहा है वही गैस सिलेंडर की कीमत 3000 से लेकर 4,500 रुपये तक पहुंच जाने से उनका पूरा आर्थिक संतुलन बिगड़ गया है। “आधी कमाई तो गैस में ही चली जाएगी, ऐसे में बाकी खर्च कैसे चलेंगे?” यह सवाल आज हर प्रवासी मजदूर के सामने खड़ा है।
सिर्फ महंगाई ही नहीं, बल्कि शहरी ढांचे की सीमाएं भी मजदूरों की मुश्किलें बढ़ा रही हैं। अधिकांश किराए के कमरों में न तो इंडक्शन चूल्हा चलाने की अनुमति है और न ही वैकल्पिक ईंधन का कोई साधन। ऐसे में खाना बनाना भी एक चुनौती बन गया है। भूखे पेट काम करना संभव नहीं, और काम के बिना गुजारा नहीं, इसी दोहरी मार ने मजदूरों को अपने गांव लौटने पर विवश कर दिया है।
संकट के बहुआयामी कारण
विशेषज्ञों के अनुसार यह स्थिति केवल गैस आपूर्ति की समस्या नहीं, बल्कि शहरी गरीबों के लिए सुरक्षा जाल (social safety net) की कमी को भी उजागर करती है।
🔹गैस की कालाबाजारी और सप्लाई चेन में व्यवधान
🔹न्यूनतम वेतन और महंगाई के बीच बढ़ता अंतर
🔹किराए के आवासों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव
🔹वैकल्पिक ऊर्जा साधनों की अनुपलब्धता
ये सभी कारक मिलकर एक “आर्थिक अस्थिरता का चक्र” तैयार कर रहे हैं, जिसमें सबसे ज्यादा प्रभावित प्रवासी मजदूर हो रहे हैं।
सामाजिक प्रभाव
इस पलायन का असर केवल शहरों तक सीमित नहीं रहेगा। बिहार जैसे राज्यों में अचानक बढ़ती श्रमिक आबादी से स्थानीय रोजगार पर दबाव बढ़ेगा। वहीं, दिल्ली जैसे शहरों में उद्योगों को सस्ते श्रम की कमी का सामना करना पड़ सकता है।
क्या कहती है व्यवस्था?
सरकारी स्तर पर अभी तक इस मुद्दे पर कोई ठोस हस्तक्षेप नजर नहीं आ रहा है। यदि जल्द ही गैस की आपूर्ति को सामान्य नहीं किया गया और कीमतों पर नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो यह संकट और गहरा सकता है।
प्रवासी मजदूर केवल “श्रम शक्ति” नहीं हैं, बल्कि वे शहरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। यदि वे ही अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करने लगें, तो यह न केवल आर्थिक बल्कि मानवीय संकट भी है।
सरकार और प्रशासन के लिए यह समय है कि वे त्वरित और प्रभावी कदम उठाएं ताकि मजदूरों को उनके हक का जीवन और सम्मान मिल सके, और शहरों की रफ्तार भी बरकरार रह सके।
