CUSB के डॉ. प्रशांत ने ग्रीस में प्रस्तुत किया स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण पर शोध, 55 देशों के विशेषज्ञों ने लिया सम्मेलन में भाग
आर्यावर्त वाणी | गयाजी | 14 अक्टूबर 2026
गयाजी। दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (CUSB) के पर्यावरण विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. प्रशांत ने ग्रीस के क्रीट द्वीप स्थित चानिया शहर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में अपना शोध प्रस्तुत कर विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया। इंटरनेशनल वाटर एसोसिएशन (IWA) के अंतर्गत जल प्रदूषण नियंत्रण और वेटलैंड तकनीकों से संबंधित विषयों पर आयोजित इस सम्मेलन में 55 देशों के लगभग 350 वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों ने भाग लिया। स्वच्छता, अपशिष्ट प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विषयों पर केंद्रित इस शोध प्रस्तुति को विश्वविद्यालय की शोध गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
भारत सरकार की वित्तपोषित परियोजना का हिस्सा है शोध
विश्वविद्यालय के जनसंपर्क पदाधिकारी (पीआरओ) मोहम्मद मुदस्सीर आलम ने बताया कि डॉ. प्रशांत का शोध भारत सरकार के अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान प्रतिष्ठान (ANRF) से वित्तपोषित परियोजना का हिस्सा है। अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने और शोध प्रस्तुत करने के लिए उन्हें ANRF तथा CUSB की ओर से अंतरराष्ट्रीय यात्रा सहायता भी प्रदान की गई।
इस परियोजना के तहत कृत्रिम वेटलैंड की सहायता से अपशिष्ट का उपचार करने की तकनीक पर काम किया जा रहा है। इसमें प्राकृतिक जैविक प्रक्रियाओं का उपयोग करके अपशिष्ट को सुरक्षित ढंग से उपचारित करने की संभावनाओं का अध्ययन किया जा रहा है।
मलयुक्त कीचड़ के सुरक्षित उपचार पर केंद्रित शोध
डॉ. प्रशांत ने सम्मेलन में शौचालयों से निकलने वाले मलयुक्त कीचड़ (फीकल स्लज) के सुरक्षित उपचार और उसके उपयोग की संभावनाओं पर शोध पत्र प्रस्तुत किया। शोध का मुख्य उद्देश्य ऐसी तकनीक विकसित करने की दिशा में काम करना है, जिसके माध्यम से प्राकृतिक प्रक्रियाओं की मदद से मलयुक्त कीचड़ का बेहतर उपचार किया जा सके और इससे पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
कृत्रिम वेटलैंड आधारित तकनीक में प्राकृतिक जैविक प्रक्रियाओं का उपयोग करते हुए अपशिष्ट के उपचार की संभावनाओं का अध्ययन किया जाता है। इस तरह की तकनीक उचित परिस्थितियों में अपशिष्ट प्रबंधन को अधिक टिकाऊ बनाने में सहायक हो सकती है।
स्वच्छ भारत मिशन के उद्देश्यों के अनुरूप पहल
यह शोध केंद्र सरकार के स्वच्छ भारत मिशन की भावना के अनुरूप है। स्वच्छता के क्षेत्र में शौचालयों का निर्माण जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी उनसे निकलने वाले अपशिष्ट का सुरक्षित प्रबंधन भी है। मलयुक्त कीचड़ का उचित उपचार नहीं होने पर जलस्रोतों और आसपास के पर्यावरण को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। ऐसे में प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर आधारित उपचार तकनीकों का विकास स्वच्छता व्यवस्था को टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जाता है।
अपशिष्ट से उपयोगी संसाधन प्राप्त करने की संभावनाओं पर जोर
डॉ. प्रशांत ने बताया कि इस प्रकार के शोध का उद्देश्य केवल मलयुक्त कीचड़ का निपटान करना नहीं है, बल्कि उसका सुरक्षित उपचार करके उससे उपयोगी संसाधन प्राप्त करने की संभावनाओं का पता लगाना भी है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर आधारित ऐसी व्यवस्था ग्रामीण और छोटे शहरी क्षेत्रों के लिए उपयोगी हो सकती है, जहां टिकाऊ एवं उपयुक्त अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था की आवश्यकता है।
इस दिशा में प्रभावी तकनीकों के विकास से नालों, तालाबों और अन्य जलस्रोतों में गंदगी पहुंचने के जोखिम को कम करने तथा स्वच्छ वातावरण बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ स्वच्छता की दिशा में शोध
डॉ. प्रशांत की अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भागीदारी से CUSB के पर्यावरण विज्ञान विभाग के शोध कार्यों को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर मिला। उनका शोध स्वच्छता, अपशिष्ट उपचार और पर्यावरण संरक्षण के बीच संबंधों को रेखांकित करता है। प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर आधारित उपचार तकनीकों के विकास से भविष्य में ग्रामीण और छोटे शहरी क्षेत्रों में टिकाऊ अपशिष्ट प्रबंधन के नए विकल्प तलाशने में मदद मिल सकती है।
