बड़ी उपलब्धि: नैनोप्रौद्योगिकी में अभिनव खोज के लिए सीयूएसबी को मिला पहला भारतीय पेटेंट
आर्यावर्त वाणी | गयाजी | 25 अगस्त 2026
गयाजी: दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) ने नैनोप्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। भारतीय पेटेंट कार्यालय ने विश्वविद्यालय को उसकी अभिनव नैनोप्रौद्योगिकी खोज के लिए पहला भारतीय पेटेंट आधिकारिक रूप से प्रदान किया है। पेटेंट का आवेदन संख्या 201931047638 और पेटेंट संख्या 597876 है।
पेटेंट का शीर्षक “संवर्धित सौर-उत्प्रेरण हेतु प्रथम एवं द्वितीय निकट-अवरक्त क्षेत्र में ट्यूनेबल प्लास्मोनिक होलो सिल्वर नैनोशेल्स का शून्य आरपीएम संश्लेषण” है।
सीयूएसबी के शोधकर्ताओं की अहम भूमिका
विश्वविद्यालय के जनसंपर्क पदाधिकारी मोहम्मद मुदस्सीर आलम के अनुसार, यह उपलब्धि रसायन विज्ञान विभाग के प्रमुख आविष्कारक प्रो. अमिया प्रियम, शोधार्थी भावेश कुमार दाधीच तथा भुवनेश्वर स्थित कलिंग औद्योगिक प्रौद्योगिकी संस्थान के अनुसंधान सहयोगी डॉ. भव्य भूषण के शोध एवं प्रयासों का परिणाम है।
कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह, कुलसचिव प्रो. नरेंद्र कुमार राणा, संकायाध्यक्ष एवं विभागाध्यक्ष प्रो. अतुल प्रताप सिंह सहित विश्वविद्यालय परिवार ने इस उपलब्धि पर शोध दल को बधाई दी।
बिना घुमाव के नैनोशेल्स का हरित संश्लेषण
इस आविष्कार की प्रमुख विशेषता शून्य आरपीएम आधारित संश्लेषण प्रक्रिया है। यानी उच्च गुणवत्ता वाले नैनोशेल्स को तैयार करने के लिए चुंबकीय या यांत्रिक सरगर्मी की आवश्यकता नहीं होती। इससे ऊर्जा की खपत कम होती है और नैनोमटेरियल तैयार करने की प्रक्रिया को अधिक लागत-प्रभावी एवं पर्यावरण-अनुकूल बनाने की संभावना है।
एनआईआर-II क्षेत्र तक पहुंची तकनीक
इस तकनीक में खोखले सिल्वर नैनोशेल्स के सरफेस प्लास्मोन रेजोनेंस को 1150 नैनोमीटर तक ट्यून किया गया है, जिससे यह द्वितीय निकट-अवरक्त यानी NIR-II (1000–1400 नैनोमीटर) क्षेत्र तक पहुंचता है।
40 से 62 नैनोमीटर आकार वाले नैनोशेल्स में दो अलग-अलग उच्च-तीव्रता वाले प्रकाशीय अवशोषण पीक भी उत्पन्न किए गए हैं। शोध के अनुसार इनमें क्वाड्रुपोल और सिमेट्रिक डाइपोल प्लास्मोन रेजोनेंस शामिल हैं।
कैंसर उपचार से लेकर जल शोधन तक संभावनाएं
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस तकनीक के संभावित अनुप्रयोग चिकित्सा और पर्यावरण दोनों क्षेत्रों में हैं। एनआईआर क्षेत्र में प्रकाश की गहरी पैठ की क्षमता के कारण इसका उपयोग भविष्य में कैंसर के सटीक निदान एवं उपचार से जुड़ी तकनीकों में किया जा सकता है।
इसके अलावा, नैनोशेल्स का उपयोग सौर ऊर्जा की सहायता से कपड़ा उद्योग से निकलने वाले मिथाइल ऑरेंज और ब्रोमोक्रेसोल ग्रीन जैसे हानिकारक रंगीन अपशिष्टों के विघटन और जल शोधन में भी किया जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में भी मिली मान्यता
प्रो. अमिया प्रियम के अनुसार, इस नैनोप्रौद्योगिकी अनुसंधान को अमेरिकन केमिकल सोसायटी और रॉयल सोसायटी ऑफ केमिस्ट्री की प्रमुख शोध पत्रिकाओं में भी मान्यता मिली है। शोध को भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से शोध अनुदान भी प्राप्त हुआ है।
उन्होंने कहा कि इस आविष्कार का महत्वपूर्ण उपयोग वस्त्र उद्योग से निकलने वाले रंगीन अपशिष्टों के पर्यावरणीय शोधन में सौर ऊर्जा के प्रभावी उपयोग के लिए किया जा सकता है। साथ ही नैनोशेल्स के विशिष्ट गुण चिकित्सा क्षेत्र में भी संभावनाएं खोलते हैं।
नवाचार और तकनीक हस्तांतरण पर जोर
कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह ने कहा कि सीयूएसबी नवाचार, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और व्यावसायीकरण को बढ़ावा देने के लिए अपने शोध बुनियादी ढांचे तथा शैक्षणिक-सद्योगिक साझेदारियों को लगातार मजबूत कर रहा है। विश्वविद्यालय के लिए यह पहला भारतीय पेटेंट शोध एवं नवाचार के क्षेत्र में उसकी बढ़ती क्षमता को रेखांकित करता है।

