गयाजी में 60 से अधिक विभाग, हजारों कर्मचारी और करोड़ों का बजट… फिर भी क्यों परेशान है आम आदमी?
आर्यावर्त वाणी | गयाजी | 12 जून 2026,
रिपोर्ट – दिलीप कुमार, आर्यावर्त वाणी
गयाजी: अगर आपसे अचानक पूछा जाए कि गयाजी जिले में आम लोगों की सुविधा और समस्याओं के समाधान के लिए कितने सरकारी विभाग कार्यरत हैं, तो शायद अधिकांश लोग पुलिस, स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, पानी और राजस्व विभाग तक ही सीमित रह जाएंगे। कुछ लोग कृषि और पंचायत विभाग का नाम भी जोड़ देंगे। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं बड़ी है।
गयाजी जिले में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 60 से अधिक विभाग, कार्यालय, निगम, मिशन और प्राधिकरण कार्यरत हैं। सरकार ने समाज के लगभग हर वर्ग और हर समस्या के समाधान के लिए अलग-अलग विभागों का गठन कर रखा है। कृषि, पशुपालन, मत्स्य, सहकारिता, स्वास्थ्य, शिक्षा, श्रम, परिवहन, समाज कल्याण, अल्पसंख्यक कल्याण, आपदा प्रबंधन, खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण, माप-तौल, फूड सेफ्टी, औषधि नियंत्रण, पर्यटन, उद्योग, नगर विकास और ग्रामीण विकास जैसे अनेक विभाग जनता की सेवा के लिए बनाए गए हैं।
इन विभागों में हजारों अधिकारी और कर्मचारी कार्यरत हैं। इनके संचालन पर हर माह करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। इसके बावजूद आम आदमी की जुबान पर एक ही सवाल रहता है— आखिर इतनी बड़ी व्यवस्था होने के बाद भी समस्याएं खत्म क्यों नहीं होतीं?
विभागों की कमी नहीं, जानकारी की कमी भी बड़ी समस्या
आज भी जिले के अधिकांश लोगों को यह जानकारी नहीं होती कि उनकी समस्या किस विभाग से जुड़ी है और उसका समाधान कहां मिलेगा। पेंशन, राशन, भूमि विवाद, नल-जल योजना, छात्रवृत्ति, कृषि अनुदान, श्रमिक पंजीकरण, खाद्य सुरक्षा या उपभोक्ता अधिकार जैसे मामलों में लोग अक्सर सही विभाग तक पहुंच ही नहीं पाते।
नतीजा यह होता है कि लोग एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक चक्कर लगाते रहते हैं। कई मामलों में समस्या इसलिए लंबी खिंच जाती है क्योंकि शिकायत सही जगह तक पहुंचती ही नहीं।
कुछ विभागों का नाम तक नहीं जानते लोग
गयाजी जिले में ऐसे अनेक विभाग हैं जिनका नाम तक आम नागरिकों ने नहीं सुना है। कई विभाग जनता के बीच कम और फाइलों में ज्यादा दिखाई देते हैं। यही कारण है कि योजनाएं और व्यवस्थाएं होने के बावजूद उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाता।
सरकार ने विभाग तो बना दिए, लेकिन उन विभागों और उनकी जिम्मेदारियों की जानकारी लोगों तक पहुंचाने की व्यवस्था उतनी मजबूत नहीं बन सकी।
कुछ विभाग सिर्फ अभियान के समय ही क्यों दिखते हैं?
जिले में कुछ ऐसे विभाग भी हैं जिनका संबंध सीधे आम नागरिकों के स्वास्थ्य, अधिकार और आर्थिक हितों से है, लेकिन उनकी सक्रियता अक्सर किसी विशेष अभियान, त्योहार या शिकायत के बाद ही नजर आती है।
माप-तौल विभाग इसका एक उदाहरण है। यदि यह विभाग नियमित रूप से बाजारों में जांच करे तो ग्राहकों को कम तौल और गलत माप से राहत मिल सकती है। लेकिन अधिकांश लोग शायद ही कभी इस विभाग की नियमित कार्रवाई देखते हों।
इसी प्रकार फूड सेफ्टी विभाग की जिम्मेदारी है कि बाजार में बिक रहे खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता सुनिश्चित की जाए। यदि यह विभाग लगातार सक्रिय रहे तो मिलावटी दूध, नकली मसाले, खराब मिठाइयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक खाद्य पदार्थों पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है।
औषधि नियंत्रक विभाग की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। नकली दवाओं, एक्सपायरी दवाओं और मानक से कम गुणवत्ता वाली दवाओं की बिक्री पर रोक लगाना इसकी जिम्मेदारी है। लेकिन आम लोगों को अक्सर इसकी मौजूदगी का एहसास तभी होता है जब कोई बड़ी छापेमारी या कार्रवाई होती है।
यह तो केवल कुछ उदाहरण हैं। ऐसे अनेक विभाग हैं जिनकी नियमित और प्रभावी सक्रियता आम लोगों के जीवन को सीधे प्रभावित कर सकती है।
हजारों कर्मचारी, फिर भी शिकायतों का अंबार
यदि शिक्षा विभाग को देखें तो हजारों शिक्षक और कर्मचारी कार्यरत हैं। स्वास्थ्य विभाग में डॉक्टर, नर्स, एएनएम और आशा कार्यकर्ता मौजूद हैं। पुलिस विभाग, ग्रामीण विकास विभाग, कृषि विभाग, राजस्व विभाग और पंचायत व्यवस्था में भी बड़ी संख्या में कर्मचारी तैनात हैं।
इसके बावजूद गर्मी आते ही पेयजल संकट की खबरें सामने आती हैं। नल-जल योजनाओं की खराबी की शिकायतें मिलती हैं। कही सड़क टूटी है तो कहीं उसी सड़क पर अतिक्रमण जारी है, तो कही नली भरी पड़ी है तो कहीं गंदगी का अम्बार लगा है। सरकारी विद्यालयों में संसाधनों की कमी की चर्चा भी रोज होती है। अस्पतालों में डॉक्टरों और सुविधाओं को लेकर सवाल उठते हैं। भूमि विवादों के मामले तो वर्षों तक लंबित पड़े रहते हैं और आम आदमी कार्यालयों के चक्कर लगाने में अपनी एड़ियां घिसते रहते है।
ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जब व्यवस्था इतनी बड़ी है तो परिणाम अपेक्षा के अनुरूप क्यों नहीं दिखाई देते?
आखिर समस्या कहां है?
विशेषज्ञों और प्रशासनिक जानकारों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं।
🔹सबसे पहली समस्या जवाबदेही की है। किसी योजना के असफल होने या किसी समस्या के लंबे समय तक बने रहने पर जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती।
🔹दूसरी समस्या निगरानी व्यवस्था की है। कई योजनाओं का नियमित निरीक्षण और मूल्यांकन नहीं हो पाता, जिससे कमियां समय रहते सामने नहीं आ पातीं।
🔹तीसरी समस्या जागरूकता की है। जनता को अपने अधिकारों और संबंधित विभागों की जानकारी नहीं होने के कारण उपलब्ध सुविधाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।
🔹चौथी समस्या यह है कि कई अधिकारियों को एक साथ कई जिम्मेदारियां सौंप दी जाती हैं, जिससे वे किसी एक कार्य पर पूरा ध्यान नहीं दे पाते।
समाधान क्या है?
स्थिति में सुधार के लिए केवल नई बहालियां पर्याप्त नहीं होंगी। आवश्यकता व्यवस्था को अधिक जवाबदेह और जनकेंद्रित बनाने की है।
🔹प्रत्येक पंचायत और वार्ड स्तर पर विभागवार सूचना बोर्ड लगाए जाएं ताकि लोगों को पता चल सके कि किस समस्या के लिए किस विभाग से संपर्क करना है।
🔹सभी विभागों की कार्यप्रणाली और शिकायत निवारण प्रक्रिया को डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाए।
🔹फील्ड निरीक्षण और सामाजिक ऑडिट को नियमित किया जाए ताकि योजनाओं की वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
🔹माप-तौल, फूड सेफ्टी, औषधि नियंत्रण और उपभोक्ता संरक्षण जैसे विभागों की नियमित बाजार निगरानी सुनिश्चित की जाए।
🔹प्रत्येक विभाग के लिए समयबद्ध सेवा गारंटी और सार्वजनिक जवाबदेही की व्यवस्था लागू हो।
जनता को भी निभानी होगी भूमिका
सिर्फ सरकार या प्रशासन को दोष देने से समाधान नहीं निकलेगा। नागरिकों को भी अपने अधिकारों, योजनाओं और विभागों की जानकारी रखनी होगी। शिकायत दर्ज कराने, सूचना मांगने और जनहित के मुद्दों को उठाने में सक्रिय भागीदारी निभानी होगी।
गयाजी जिले में समस्याओं के समाधान के लिए विभाग भी हैं, अधिकारी भी हैं, कर्मचारी भी हैं और बजट भी है। जरूरत इस बात की है कि इन संसाधनों का लाभ वास्तव में आम लोगों तक पहुंचे।
किसी जिले की सफलता उसके कार्यालयों, भवनों और कर्मचारियों की संख्या से नहीं मापी जाती। उसकी सफलता इस बात से तय होती है कि आम नागरिक को कितनी आसानी, पारदर्शिता और सम्मान के साथ सरकारी सेवाएं प्राप्त हो रही हैं।
आज सबसे बड़ा सवाल यही है— जब जनता की सेवा के लिए 60 से अधिक विभाग मौजूद हैं, तो फिर आम आदमी को अपनी बुनियादी जरूरतों और अधिकारों के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है?
शायद इसका जवाब नए विभाग बनाने में नहीं, बल्कि मौजूदा विभागों को अधिक सक्रिय, जवाबदेह और जनोन्मुखी बनाने में छिपा है।

