CUSB में स्थापित हुआ बिहार का पहला एथेलोमीटर निगरानी तंत्र, ब्लैक कार्बन और जलवायु परिवर्तन पर शोध होगा मजबूत

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आर्यावर्त वाणी | गयाजी | 15 अक्टूबर 2026

गयाजी। जलवायु परिवर्तन के कारणों, वायुमंडलीय प्रदूषण और मौसम पर एरोसोल के प्रभावों को बेहतर ढंग से समझने की दिशा में दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (CUSB) ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेटिओरोलॉजी (IITM) के सहयोग से विश्वविद्यालय परिसर में एरोसोल नेटवर्क कार्यक्रम के तहत नई पीढ़ी का एथेलोमीटर (AE36s) स्थापित किया गया है। इस उपकरण से वातावरण में मौजूद प्रकाश-अवशोषित करने वाले कणों, विशेषकर ब्लैक कार्बन, के स्तर और संभावित उत्सर्जन स्रोतों का निरंतर अध्ययन करने में मदद मिलेगी।

विश्वविद्यालय के अनुसार, यह बिहार राज्य में स्थापित पहला एथेलोमीटर निगरानी तंत्र है। इसके माध्यम से प्राप्त आंकड़े क्षेत्रीय मौसम, बादलों के निर्माण, वर्षा और जलवायु परिवर्तन से जुड़े विभिन्न पहलुओं के वैज्ञानिक अध्ययन में उपयोगी साबित हो सकते हैं।

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के एरोसोल नेटवर्क से जुड़ा CUSB

भारत-गंगा के मैदानी क्षेत्र (IGP) और हिमालय की तलहटी में वायुमंडलीय एरोसोल की निगरानी को मजबूत करने के उद्देश्य से रणनीतिक रूप से चयनित छह स्थानों पर एरोसोल नेटवर्क कार्यक्रम स्थापित करने की पहल की गई है। इसी क्रम में IITM के वैज्ञानिक एफ डॉ. अतुल कुमार श्रीवास्तव ने अपनी टीम के साथ दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय परिसर का दौरा किया।

इस दौरान विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग की पर्यावरणीय मॉडलिंग प्रयोगशाला में एथेलोमीटर स्थापित किया गया। इस कार्य में विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं अधिष्ठाता प्रो. प्रधान पार्थ सारथी ने सहयोग किया। इस स्थापना से विश्वविद्यालय में वायुमंडलीय एरोसोल के नियमित मापन और उनसे जुड़े वैज्ञानिक अनुसंधान की संभावनाएं बढ़ेंगी।

ब्लैक कार्बन और जैवभार दहन के उत्सर्जन का होगा अध्ययन

एथेलोमीटर एक ऐसा वैज्ञानिक उपकरण है, जो वातावरण में मौजूद प्रकाश को अवशोषित करने वाले एरोसोल की निगरानी में उपयोग किया जाता है। इनमें ब्लैक कार्बन प्रमुख है, जो जैवभार दहन सहित विभिन्न दहन प्रक्रियाओं से उत्पन्न हो सकता है।

इस उपकरण के जरिए ब्लैक कार्बन और संबंधित एरोसोल के स्तर में होने वाले बदलावों का लगातार आकलन किया जा सकेगा। इससे संभावित उत्सर्जन स्रोतों की पहचान और उनके प्रभावों को समझने में वैज्ञानिकों को मदद मिलने की उम्मीद है।

वायुमंडल में मौजूद इन कणों का संबंध सूर्य से आने वाले विकिरण के अवशोषण और वातावरण की ऊर्जा-संतुलन प्रक्रिया से भी है। ऐसे में इनका नियमित मापन जलवायु परिवर्तन के क्षेत्रीय कारकों और उनके संभावित प्रभावों का विश्लेषण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

बादलों के निर्माण और वर्षा पर प्रभाव समझने में मिलेगी मदद

एरोसोल वातावरण में विकिरण, बादलों के निर्माण और वर्षा से जुड़ी प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकते हैं। CUSB में स्थापित निगरानी तंत्र से मिलने वाले आंकड़ों के आधार पर शोधकर्ता इन प्रक्रियाओं के बीच संबंधों का अध्ययन कर सकेंगे।

विश्वविद्यालय की ओर से बताया गया कि इन मापों से क्षेत्र में बादलों के निर्माण, वर्षा तथा उनसे संबंधित संभावित जलवायवीय प्रभावों को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिलने की अपेक्षा है। यह अध्ययन विशेष रूप से भारत-गंगा के मैदानी क्षेत्र में वायुमंडलीय परिस्थितियों और क्षेत्रीय मौसम के बीच संबंधों को समझने के लिए उपयोगी हो सकता है।

पर्यावरण विज्ञान प्रयोगशाला में विशेषज्ञों ने समझीं उपकरण की बारीकियां

एथेलोमीटर की स्थापना के अवसर पर पर्यावरण विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. राजेश कुमार रंजन तथा पृथ्वी, जैविक एवं पर्यावरण विज्ञान विद्यापीठ (SEBES) के अधिष्ठाता प्रो. रिजवानुल हक उपस्थित रहे। उन्होंने उपकरण की कार्यप्रणाली, उसकी तकनीकी विशेषताओं और वैज्ञानिक उपयोगों के बारे में जानकारी प्राप्त की।

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह और कुलसचिव प्रो. नरेंद्र कुमार राणा ने मंत्रालय के राष्ट्रीय नेटवर्क कार्यक्रम से विश्वविद्यालय को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए प्रो. प्रधान पार्थ सारथी को बधाई दी।

मंत्रालय के बिजली-तड़ित नेटवर्क कार्यक्रम का भी समन्वय कर रहे प्रो. सारथी

विश्वविद्यालय के जनसंपर्क पदाधिकारी मोहम्मद मुदस्सीर आलम ने बताया कि प्रो. प्रधान पार्थ सारथी भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के स्थानिक बिजली-तड़ित नेटवर्क कार्यक्रम का भी समन्वय कर रहे हैं।

प्रो. सारथी ने बताया कि बिहार में एथेलोमीटर निगरानी तंत्र की स्थापना वैज्ञानिक अनुसंधान की दृष्टि से काफी उपयोगी है। इससे वायुमंडलीय प्रदूषण और जलवायु से संबंधित महत्वपूर्ण आंकड़े जुटाने में मदद मिलेगी।

भविष्य में मौसम केंद्र और अन्य निगरानी प्रणालियां भी होंगी एकीकृत

इस परियोजना के अगले चरणों में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की ओर से अतिरिक्त एरोसोल मापन प्रणालियों, स्वचालित मौसम केंद्र (AWS) तथा अन्य वायुमंडलीय मानकों की निगरानी को एकीकृत करने की योजना है। इससे विश्वविद्यालय परिसर में वायुमंडलीय परिस्थितियों के अध्ययन के लिए अधिक व्यापक प्रेक्षण व्यवस्था विकसित की जा सकेगी।

इस विस्तारित व्यवस्था से एरोसोल, विकिरण, बादलों और वर्षण के बीच पारस्परिक संबंधों का अध्ययन और प्रभावी तरीके से किया जा सकेगा। इसके आधार पर क्षेत्रीय मौसम और जलवायु पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने में वैज्ञानिकों को सहायता मिलने की उम्मीद है।

CUSB में एरोसोल नेटवर्क कार्यक्रम की स्थापना पर्यावरण विज्ञान और जलवायु अनुसंधान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल है। इससे विश्वविद्यालय में शोध गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलने के साथ बिहार में वायुमंडलीय निगरानी और जलवायु संबंधी अध्ययन के लिए वैज्ञानिक आधार मजबूत होने की संभावना है।

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