सीयूएसबी में ‘भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण शोध’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न, 23 राज्यों के 194 शोधार्थियों ने प्रस्तुत किए
आर्यावर्त वाणी | गयाजी | 30 मार्च 2026,
गयाजी; दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) में ‘भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण शोध: दृष्टि, चुनौतियां एवं संभावनाएं’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी सफलतापूर्वक संपन्न हो गई। कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह के संरक्षण में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग तथा शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस संगोष्ठी में देश के 23 प्रांतों से आए 194 शोधार्थियों ने कुल सात सत्रों में अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए।
उद्घाटन सत्र में 80 शोध-पत्रों का प्रकाशन
संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र के दौरान 80 शोध-पत्रों का विधिवत प्रकाशन किया गया, जो इस आयोजन की महत्वपूर्ण उपलब्धि रही। कार्यक्रम संयोजन प्रो. के. शिव शंकर के नेतृत्व में हुआ। समापन सत्र में आयोजन सचिव डॉ. विकल कुमार सिंह ने दो दिवसीय गतिविधियों और उपलब्धियों का विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।
शोध के निष्कर्षों को व्यवहार में लाने पर जोर
राष्ट्रीय सह-संयोजक, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली के डॉ. राजेश्वर कुमार ने कहा कि संगोष्ठी से प्राप्त निष्कर्षों को संकलित कर प्रकाशित किया जाएगा और उन्हें व्यवहारिक रूप देने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने अखिल भारतीय शोध योजना के तहत एक हजार शोधार्थियों को चिन्हित करने और उन्हें विषय चयन में स्वतंत्रता देने की आवश्यकता पर बल दिया।
युवाओं को आत्मजागरण और अनुशासन का संदेश
मुख्य अतिथि संजीव कुमार (सीएमडी, हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड) ने कहा कि देश की बागडोर युवाओं के हाथ में है और उन्हें बदलते तकनीकी दौर के अनुसार स्वयं को ढालना होगा। उन्होंने युवाओं को अनुशासन और आत्मजागरण का संदेश देते हुए कहा कि अच्छा इंसान बनना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
मातृभाषा में शोध पर दिया गया विशेष जोर
अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह ने कहा कि भारत सरकार “जय अनुसंधान” के माध्यम से शोध को बढ़ावा दे रही है। उन्होंने मातृभाषा में शोध की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि भारत की भाषाई विविधता उसकी सांस्कृतिक शक्ति है।
वहीं बीआर अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दिनेश चंद्र राय ने कहा कि मातृभाषा में शोध समाज के लिए अधिक उपयोगी और प्रभावी होता है। उन्होंने शोधार्थियों को सामाजिक उपयोगिता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए कार्य करने की सलाह दी।
सामूहिक प्रयास से विकसित भारत का लक्ष्य संभव
डॉ. मोहन कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि भाषाई गुणवत्ता के सुधार के लिए इस प्रकार की संगोष्ठियां आवश्यक हैं। उन्होंने स्वदेशी को अपनाने और सामूहिक प्रयासों से भारत को विकसित राष्ट्र एवं ‘विश्वगुरु’ बनाने पर जोर दिया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष, प्राध्यापक, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राओं की गरिमामयी उपस्थिति रही।
