शिक्षा या व्यापार? नए सत्र का बोझ: प्राइवेट स्कूलों की किताब-नीति से अभिभावक परेशान
आर्यावर्त वाणी | पटना | 09 अप्रैल 2026,
पटना / 09 अप्रैल 2026। अप्रैल का महीना आते ही देशभर में स्कूलों का नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो जाता है। जहां एक ओर बच्चे नई कक्षा में जाने को उत्साहित रहते हैं, वहीं दूसरी ओर अभिभावकों के लिए यह समय आर्थिक दबाव का कारण बनता जा रहा है। खासकर प्राइवेट स्कूलों द्वारा हर साल नई किताबें और अन्य शैक्षणिक सामग्री खरीदने का दबाव अभिभावकों की जेब पर भारी पड़ रहा है।
किताबों के नाम पर भारी खर्च
अभिभावकों का कहना है कि नर्सरी से लेकर प्राथमिक कक्षाओं तक के बच्चों के लिए भी 3,000 से 10,000 रुपये तक केवल किताबों और कॉपियों पर खर्च हो जाते हैं। कई स्कूल विशेष प्रकाशकों की किताबें अनिवार्य कर देते हैं, जो केवल स्कूल या तय दुकानों पर ही उपलब्ध होती हैं। इससे अभिभावकों के पास सस्ते विकल्प चुनने का विकल्प भी खत्म हो जाता है।
हर साल बदलती किताबें
सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई स्कूल हर साल किताबों का सिलेबस बदल देते हैं। इससे बड़े बच्चों की पुरानी किताबें छोटे बच्चों के काम नहीं आ पातीं। न तो सेकेंड-हैंड बाजार का फायदा मिलता है और न ही आपस में किताबें साझा हो पाती हैं।
दो या उससे अधिक बच्चों वाले परिवारों पर बढ़ता बोझ
जिन परिवारों में दो या दो से अधिक बच्चे हैं, उनके लिए यह समस्या और गंभीर हो जाती है। हर बच्चे के लिए अलग-अलग कक्षा की किताबें, यूनिफॉर्म और अन्य खर्च मिलाकर कुल राशि कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे में मध्यम और निम्न आय वर्ग के अभिभावकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो जाता है कि वे इतनी बड़ी रकम का इंतजाम आखिर करें तो कैसे।
अन्य खर्च भी कम नहीं
किताबों के अलावा यूनिफॉर्म, जूते, बैग, स्कूल डायरी, आईडी कार्ड, स्मार्ट क्लास फीस, एक्टिविटी चार्ज और ट्रांसपोर्ट फीस जैसे कई अन्य मदों में भी अभिभावकों से मोटी रकम वसूली जाती है। एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यह कुल खर्च 15,000 से 40,000 रुपये तक पहुंच जाता है।
कमीशन का खेल: स्कूल–प्रकाशक गठजोड़ पर सवाल
इस पूरे सिस्टम में सबसे ज्यादा फायदा स्कूल संचालकों को होने की बात सामने आ रही है। सूत्रों के अनुसार, कई प्रकाशक और किताब विक्रेता स्कूल प्रबंधन को मोटा कमीशन देते हैं, ताकि उनकी किताबें ही अनिवार्य कराई जाएं।
एक स्कूल संचालक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि किताबों के एमआरपी पर 50 से 60 प्रतिशत तक का कमीशन मिलता है। यही कारण है कि हर साल नई किताबें लागू करने और विशेष प्रकाशकों को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।
अभिभावकों की मजबूरी और चुप्पी
कोई भी अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा से समझौता नहीं करना चाहता। शायद यही वजह है कि अधिकांश अभिभावक बिना “इफ-बट” किए स्कूलों की इस मनमानी को सहन कर लेते हैं। बच्चों के भविष्य के सामने आर्थिक बोझ को नजरअंदाज करना उनकी मजबूरी बन जाती है।
सिस्टम इतना व्यवस्थित कि सवाल उठाना मुश्किल
यह पूरा तंत्र इतनी सफाई से चलता है कि पहली नजर में इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता। किताब दुकानदार अपनी भूमिका को सीमित बताते हैं। उनका कहना है कि वे केवल स्कूल और प्रकाशक के बीच एक माध्यम हैं और उन्हें मात्र 5 प्रतिशत तक का ही मार्जिन मिलता है। ऐसे में वे किसी तरह की छूट देने में असमर्थता जताते हैं। इससे अभिभावकों के पास विकल्प और भी सीमित हो जाते हैं।
अभिभावकों की परेशानी
स्थानीय अभिभावक बताते हैं कि महंगाई पहले से ही चरम पर है, ऐसे में शिक्षा का यह बढ़ता खर्च परिवार के बजट को बिगाड़ देता है। कई अभिभावकों को बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए कर्ज तक लेना पड़ता है।
सरकारी नियमों का पालन नहीं
सरकार द्वारा समय-समय पर स्कूलों को एनसीईआरटी या निर्धारित पाठ्यक्रम की किताबें लागू करने और मनमानी फीस वसूली पर रोक लगाने के निर्देश दिए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इन नियमों का पालन पूरी तरह नहीं हो रहा है। निगरानी तंत्र कमजोर होने के कारण निजी स्कूल अपनी मनमानी जारी रखे हुए हैं।
कुछ स्कूल पेश कर रहे सकारात्मक उदाहरण
हालांकि सभी स्कूल एक जैसे नहीं हैं। कुछ स्कूल ऐसे भी हैं जहां केवल NCERT की किताबें ही लागू की जाती हैं और छात्र उन्हें किसी भी दुकान से खरीद सकते हैं। इसके अलावा कुछ स्कूल हर साल किताबें नहीं बदलते, जिससे एक ही किताबें दूसरे बच्चों के काम आ जाती हैं। इससे अभिभावकों को काफी राहत मिलती है और शिक्षा का खर्च कुछ हद तक नियंत्रित रहता है।
विशेषज्ञों की राय
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूलों को पारदर्शिता बनाए रखनी चाहिए और अभिभावकों को सस्ते विकल्प उपलब्ध कराने चाहिए। साथ ही सरकार को भी सख्त निगरानी और स्पष्ट गाइडलाइन लागू करनी चाहिए, ताकि शिक्षा व्यापार का माध्यम न बने।
समाधान की मांग
अभिभावक संगठनों की मांग है कि:
🔹सभी स्कूलों में एक समान पाठ्यक्रम लागू हो
🔹किताबों की कीमतों पर नियंत्रण हो
🔹हर साल सिलेबस में अनावश्यक बदलाव पर रोक लगे
🔹फीस और अन्य शुल्कों का स्पष्ट ऑडिट हो
शिक्षा एक मूलभूत अधिकार है, लेकिन जब यह अत्यधिक महंगी हो जाती है तो समाज के कमजोर और मध्यम वर्ग के लिए यह एक बोझ बन जाती है। जरूरत है कि सरकार, स्कूल प्रशासन और समाज मिलकर इस समस्या का समाधान निकालें, ताकि हर बच्चे को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके।
