सीयूएसबी में ‘वंदे मातरम्–150 अमृत वाटिका’ का उद्घाटन

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आर्यावर्त वाणी | गयाजी | 18 फरवरी 2026,

गयाजी; दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) के स्थापना दिवस 27 फरवरी के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रमों की श्रृंखला के तहत परिसर में ‘वंदे मातरम्–150 अमृत वाटिका’ का भव्य उद्घाटन किया गया। कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह के मार्गदर्शन में आयोजित इस विशेष वृक्षारोपण कार्यक्रम ने विश्वविद्यालय के हरित मिशन को नई दिशा दी।

बेल की उन्नत किस्मों के 50 पौधों का रोपण

कृषि संकाय द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में बेल (Aegle marmelos) की उन्नत किस्में एनबी–9 एवं एनबी–5 के लगभग 50 पौधों का रोपण किया गया। जानकारी के अनुसार, आगामी चरण में 100 और पौधे लगाए जाएंगे, जिससे कुल संख्या 150 पूरी की जाएगी। यह पहल फल-विज्ञान अनुसंधान तथा औषधीय पौधों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

कुलपति एवं मुख्य अतिथि ने किया संयुक्त शुभारंभ

कार्यक्रम का शुभारंभ कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह एवं मुख्य अतिथि टी. वी. कट्टिमणि, पूर्व कुलपति, केंद्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय आंध्र प्रदेश, द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। प्रो. कट्टिमणि उच्च शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद् के रूप में विख्यात हैं।

कुलपति ने अपने संबोधन में कहा कि वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में इस वाटिका का नाम ‘वंदे मातरम्–150 अमृत वाटिका’ रखा गया है, जो राष्ट्रगौरव, सांस्कृतिक चेतना और हरित विकास का प्रतीक बनेगा।

पर्यावरण संरक्षण और अनुसंधान को बढ़ावा

इस अवसर पर कुलसचिव प्रो. एन. के. राणा, कृषि संकाय के अधिष्ठाता प्रो. ए. पी. सिंह, शिक्षकगण, कर्मचारीगण एवं कृषि संकाय के तृतीय वर्ष के विद्यार्थियों ने सक्रिय भागीदारी निभाई। जनसंपर्क पदाधिकारी मोहम्मद मुदस्सीर आलम के अनुसार, कार्यक्रम का सफल समन्वय डॉ. हेमंत कुमार सिंह, सह-प्राध्यापक, कृषि विभाग द्वारा किया गया।

विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक पौधरोपण कर पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की। यह आयोजन न केवल हरित परिसर निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि फलोत्पादन एवं कृषि अनुसंधान को सुदृढ़ करने की दिशा में भी प्रेरणादायक पहल साबित होगा।

विश्वविद्यालय की नई पर्यावरणीय पहचान

‘वंदे मातरम्–150 अमृत वाटिका’ आने वाले समय में विश्वविद्यालय की पर्यावरणीय एवं शैक्षणिक पहचान का प्रतीक बनेगी। यह पहल राष्ट्रप्रेम और प्रकृति संरक्षण के समन्वय का जीवंत उदाहरण है, जो परिसर को हरित, समृद्ध और अनुसंधान-उन्मुख बनाने में सहायक सिद्ध होगी।

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