सीयूएसबी के शोध ने दी चेतावनी: 2100 तक दार्जिलिंग में भूस्खलन जोखिम में तेज़ वृद्धि संभव
आर्यावर्त वाणी | गयाजी | 17 फरवरी 2026,
गयाजी। दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) के भूगोल विभाग द्वारा किए गए एक महत्वपूर्ण शोध में चेतावनी दी गई है कि वर्ष 2050 और 2100 के जलवायु परिदृश्यों के तहत दार्जिलिंग हिमालय क्षेत्र में भूस्खलन का खतरा और उससे प्रभावित जनसंख्या का जोखिम काफी बढ़ सकता है।
यह अध्ययन सहायक प्राध्यापक डॉ. सोमनाथ बेरा के मार्गदर्शन में शोधकर्ताओं की टीम द्वारा पुर्तगाल के लिस्बन विश्वविद्यालय के सहयोग से किया गया। शोध प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका इंटरनेशनल जर्नल ऑफ डिजास्टर रिस्क रिडक्शन (एल्सेवियर; क्यू1; इम्पैक्ट फैक्टर 4.5) में प्रकाशित हुआ है। कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह, जो स्वयं भूगोलविद हैं, ने शोध निष्कर्षों पर चिंता व्यक्त करते हुए संबंधित विभागों द्वारा त्वरित कदम उठाने की आवश्यकता पर बल दिया।
एआई आधारित उच्च-रिज़ॉल्यूशन विश्लेषण
जनसंपर्क पदाधिकारी मोहम्मद मुदस्सीर आलम के अनुसार, यह अध्ययन डॉ. सोमनाथ बेरा, प्रीथा घोष, डॉ. स्वपन तालुकदार, शिवम प्रियदर्शी और डॉ. राकेल मेलो द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। दार्जिलिंग हिमालय क्षेत्र वर्षा-प्रेरित भूस्खलनों के लिए संवेदनशील माना जाता है। शोध टीम ने भविष्य के भूस्खलन खतरे का परिमाणीकरण करने के लिए उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता तकनीकों का उपयोग करते हुए उच्च-रिज़ॉल्यूशन भूस्खलन संवेदनशीलता सूचकांक (LSI) विकसित किया। अध्ययन में बदलते वर्षा पैटर्न और सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के संयुक्त प्रभाव का विश्लेषण किया गया।
2100 तक जोखिम में संभावित वृद्धि
विश्लेषण से संकेत मिला कि उच्च-उत्सर्जन SSP5–8.5 परिदृश्य के तहत वर्ष 2100 तक “अत्यंत उच्च” भूस्खलन संवेदनशीलता वाले क्षेत्रों का विस्तार होगा। विशेष रूप से SSP-3 उच्च-वृद्धि परिदृश्य में अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों में जनसंख्या जोखिम वर्तमान की तुलना में छह गुना तक बढ़ने की आशंका जताई गई है।
टीम लीडर डॉ. सोमनाथ बेरा ने कहा कि भारत के अधिकांश पर्वतीय शहरों में अनियोजित बसावट विकास हुआ है, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के साथ मिलकर जोखिम को और बढ़ा रहा है। उन्होंने जोखिम-सूचित योजना (Risk-informed Planning) को पर्वतीय क्षेत्रों की सततता के लिए अनिवार्य बताया।
नीति-निर्माण के लिए वैज्ञानिक इनपुट
शोधकर्ताओं ने बताया कि यह अध्ययन जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, आपदा जोखिम न्यूनीकरण और भू-स्थानिक विश्लेषण में सीयूएसबी के योगदान को मजबूत करता है। एआई-सक्षम उच्च-रिज़ॉल्यूशन खतरा मानचित्रण और भविष्य-परिदृश्य आधारित जोखिम आकलन के संयोजन से तैयार यह मॉडलिंग ढांचा भारत के अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के वैज्ञानिक अध्ययन नीति-निर्माताओं और योजनाकारों को प्रतिक्रियात्मक आपदा प्रबंधन से आगे बढ़कर सक्रिय जोखिम न्यूनीकरण (Proactive Risk Reduction) की दिशा में कदम उठाने में मदद करेंगे।