दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में स्थापना दिवस पर राष्ट्रीय संगोष्ठी
आर्यावर्त वाणी | गयाजी | 15 फरवरी 2026,
गयाजी: दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) अपने स्थापना दिवस को पखवाड़ा समारोह के रूप में मना रहा है। इसी क्रम में विधि एवं शासन विभाग द्वारा “संवैधानिकता और परिवर्तनशील न्याय, अपनी जड़ों का सम्मान, अपने भविष्य का निर्माण” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
भारतीय संविधान की गतिशीलता पर व्याख्यान
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं मुख्य अतिथि प्रो. जय शंकर सिंह, कुलपति, राजीव गांधी राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, पंजाब ने भारतीय संविधान की महत्ता और न्याय सुनिश्चित करने में उसकी भूमिका पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने संविधान की गतिशील प्रकृति पर बल देते हुए कहा कि इस प्रकार की संगोष्ठियाँ विद्यार्थियों को संवैधानिक मूल्यों और न्याय की अवधारणा के प्रति जागरूक बनाती हैं। अपने संबोधन में उन्होंने संविधान से जुड़े व्यावहारिक उदाहरण साझा किए और नागरिकों को अपने अधिकारों की जानकारी रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।
कुलपति का आह्वान: आदर्श नागरिक निर्माण पर बल
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए सीयूएसबी के कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह ने संविधान के अनुपालन का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा संस्थान समाज के लिए आदर्श नागरिक, वकील और पेशेवर तैयार करने का दायित्व निभाते हैं।
उन्होंने विश्वविद्यालय समुदाय से आत्ममंथन, पुनरावलोकन और दूरदृष्टि के साथ भविष्य की योजना बनाने का आग्रह किया तथा शिक्षा को समाजोन्मुखी बनाने पर बल दिया।
संगोष्ठी का सफल संचालन
जनसंपर्क पदाधिकारी मोहम्मद मुदस्सीर आलम ने बताया कि कार्यक्रम के समन्वयक प्रो. प्रदीप कुमार दास एवं सह-समन्वयक डॉ. पूनम कुमारी थीं। कार्यक्रम की शुरुआत विधि एवं शासन संकाय के विभागाध्यक्ष एवं डीन प्रो. अशोक कुमार के स्वागत भाषण से हुई। समापन सहायक प्राध्यापक डॉ. चंदना सुबा के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। संचालन विधि विभाग के छात्र आदित्य सिन्हा ने किया। संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के अनेक प्राध्यापकगण एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता रही, जिससे कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
स्थापना दिवस पखवाड़े का उद्देश्य
स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित इस व्याख्यान श्रृंखला का उद्देश्य विद्यार्थियों में संवैधानिक चेतना विकसित करना तथा न्याय एवं उत्तरदायित्व की भावना को सुदृढ़ करना है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे अकादमिक संवाद और बौद्धिक विमर्श की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया।